5000 से 14,000 साल पहले बनी थीं झीलें
वैज्ञानिकों ने पाया है कि पिछले 5,000 से 14,000 साल के बीच अलकनंदा और धौलीगंगा घाटियों में कई पुरानी भूस्खलन झीलें बनी थीं। इनकी पहचान भू-आकृतिक चिह्नों और पुरातात्विक नमूनों की आयु का निर्धारण की ऑप्टिकल स्टिम्युलेटेड ल्यूमिनेसेंस(ओएसएल) तकनीक, पराग विश्लेषण, चुंबकीय गुणों और रासायनिक परीक्षणों से की गई है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि राज्य में जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की तीव्रता और बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिस कारण भूस्खलन भी बढ़ा है। राज्य में सड़क, सुरंग और जल विद्युत परियोजनाओं के लिए भी खतरा बढ़ रहा है।
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1857 से 2018 तक बने भूस्खलन बांधों की सूची
वर्ष- नदी- भूस्खलन का कारण- बांध की स्थिति
1857- मंदाकिनी- ज्ञात नहीं- 03 दिन में टूटा
1868- अलकनंदा- ज्ञात नहीं- अस्थायी
1893- अलकनंदा- चट्टान गिरना- अस्थायी
1893- अलकनंदा- चट्टान गिरना- पहली बार 1894, दोबारा 1970 में टूटा
1930- अलकनंदा- मलबा बहाव- अस्थायी
1951- पूर्वी नायर- मलबा बहाव- अस्थायी
1957- धौलीगंगा- हिमस्खलन- मलबे से भर गया
1968- ऋषिगंगा- मलबा खिसकना- 1970 में टूटा
1969- अलकनंदा- चट्टान गिरना- अस्थायी
1970- धाकनाला- मलबा बहाव- अस्थायी
1970- अलकनंदा- मलबा खिसकना- अस्थायी
1970- अलकनंदा-धौलीगंगा- हिमस्खलन- अस्थायी
1970- पाताल गंगा- मलबा बहाव- अस्थायी
1971- कनोलडिया गाड(भागीरथी)- मलबा खिसकना- अस्थायी
1978- कनोलडिया गाड- मलबा खिसकना- अस्थायी
1979- अलकनंदा- हिमस्खलन- अस्थायी
1979- क्यूनजा गाड- मलबा बहाव- अस्थायी
1998- मंदाकिनी- मलबा बहाव- अस्थायी
1998- काली- चट्टान गिरना- 12 घंटे में टूटा
2001- यमुना- मलबा खिसकना- अस्थायी
2013- मधमहेश्वर- चट्टान गिरना- अस्थायी
2018- बावरा गाड (पिंडर सहायक)- मलबा खिसकना- अभी भी बांधित
2018- सोंग नदी- चट्टान गिरना- सात घंटे में टूटा