चार राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त कर चुके अवकाश प्राप्त लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद राष्ट्रवादी विचारों के कारण एकदम से मीडिया में चर्चा में आ गए। एक सुबह उनके पास पीएमओ से फोन आया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आपसे मिलना चाहते हैं। जब प्रधानमंत्री ने उनके सामने उत्तराखंड का राज्यपाल बनने का प्रस्ताव रखा तो उन्हें लगा जैसे ये कोई सपना है।
उन्होंने धीरे से अपनी हथेली की दो उंगलियों के बीच चिकोटी काटी और खुद से पूछा- "मैं ही क्यों?" उन्होंने वाहे गुरु को याद किया और सोचा कि ये देश के लाखों सैनिकों और सिखों का सम्मान है और उन्हें वाहे गुरु ने देश की सेवा करने के लिए चुना है। लेफ्टिनेंट जनरल से उत्तराखंड के महामहिम बने गुरमीत सिंह को 15 सितंबर को पूरे एक साल हो जाएंगे। इस मौके पर अमर उजाला की उनसे लंबी बातचीत हुई।
पेश हैं इसके प्रमुख अंशः-
प्रश्न : आप फौजी रहे, आपको कई प्रतिष्ठित मेडल भी मिले। फिर आप उस पद तक कैसे पहुंचे जो आमतौर पर राजनीतिज्ञों के लिए आरक्षित माना जाता है?
मैं राजनीति में बिल्कुल नहीं आया न मेरी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि थी। रिटायरमेंट के बाद मैंने खुद को चार आदेश दिए। एक, अगर मुझे देश से जुड़ना है तो मुझे हिंदी सीखनी होगी, क्योंकि हिंदी इस देश की आत्मा है। दो, देश की सुरक्षा के लिए मुझे आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस की तकनीक सीखनी है। तीसरा, मुझे देश की सेवा करनी है। चौथा आदेश था देश से जुड़ने के लिए मुझे मीडिया से जुड़ना होगा। पांच साल टीवी चैनलों को दिए। पुलवामा हमले के बाद मैंने क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म और सैनिकों की सुरक्षा की बात उठाई।
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प्रश्न : तो मीडिया ने आपको यहां पहुंचाया?
नहीं पता। एक दिन पीएमओ से फोन आया, मुझे लगा मीडिया में मेरे किसी बयान पर पीएमओ को कोई जानकारी चाहिए होगी। पर पीएम से बातचीत के बाद मेरा जीवन बदल गया, मैं उनके विजन व दूरदृष्टि का कायल हो गया।
प्रश्न : इसीलिए आपने कोऑपरेटिव से कॉरपोरेट तक की बात की?
मैंने गुजरात में सहकारी दुग्ध आंदोलन का गहराई से अध्ययन किया है। उत्तराखंड में हिमालयी उत्पादों के छोटे-छोटे कोऑपरेटिव खोलकर बड़े पैमाने पर काम किया जा सकता है। लेकिन, अब केवल कोऑपरेटिव फार्मिंग या सोसाइटी से काम नहीं चलेगा, जब तक हम इसे कॉरपोरेट कल्चर से नहीं जोड़ेंगे। मैंने बाबा रामदेव का प्लांट देखा। वे धोती-खड़ाऊं पहनते हैं पर उनका पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर एक कॉरपोरेट कंपनी जैसा है। यह प्रयोग छोटे पैमाने पर सही, ऊपर पहाड़ों पर करना है।
प्रश्न : उत्तराखंड से तो आपका बहुत पुराना नाता रहा है। आप 90 के दशक के अंतिम सालों में बनबसा में बतौर कर्नल तैनात थे?
हां, बनबसा की पोस्टिंग के दौरान मैंने उत्तराखंड को बहुत करीब से देखा। मुझे लगा यह राज्य तो प्राकृतिक संपदा की खान है, लेकिन तब मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन यहां के लोगों की इस तरह सेवा का मौका मिलेगा।
प्रश्न : आपको नहीं लगता कि हिमालय की प्राकृतिक संपदाओं का लाभ यहां के लोगों को नहीं मिल पा रहा है?
बिलकुल ऐसा ही है। यहां इस आधुनिक दौर में भी बहुत पुराने ढंग से काम चल रहा है। राजभवन के प्रांगण में दस हनी बॉक्स लगाए गए थे। एक महीने में उसमें 110 किलो शहद निकला। मैंने दस हनी बॉक्स फूलों की घाटी में लगवाए। वहां एक महीने में 330 किलो शहद निकाला गया। आप कल्पना कीजिए हिमालय की गोद में बसी फूलों की घाटी से निकले शहद की विश्व बाजार में क्या कीमत होगी? हमें खुद मालूम नहीं है कि प्रभु ने हमें क्या आशीर्वाद दिया है। मैं जब भी जिलों का दौरा करके लौटा मैंने विभाग के सचिव व निदेशक से इस संबंध में बातचीत की है कि लोगों के सामने जो चुनौती है उसमें कैसे मदद की जा सकती है। उत्तराखंड में नायाब जड़ीबूटियां हैं। उनकी ठीक तरह से मार्केटिंग हो तो यह राज्य भारत का ही नहीं बल्कि दुनिया के सम्पन्न राज्यों में एक होगा।
प्रश्न : उत्तराखंड सैनिक बहुल प्रदेश है। आप सैन्य पृष्ठभूमि से हैं। राज्य में पूर्व सैनिकों के मसलों के समाधान के लिए आपका क्या योगदान रहा है?
सच्चे दिल व आत्मा से जवाब दूं तो पूर्व सैनिक मेरे परिवार का हिस्सा हैं। किसी भी वीरांगना के लिए राजभवन के दरवाजे हमेशा खुले हैं। जो भी राष्ट्रीय सुरक्षा में काम करता है, चाहे वह किसी भी फोर्स से हो, मेरे लिए वह सैनिक है। उनके माता, पिता व बच्चों की कोई समस्या है तो उसके निपटारे के लिए मैंने राजभवन में अधिकारी की तैनाती की है। अब तक विभिन्न माध्यमों से मिली 600 में से 100 से ज्यादा शिकायतों का निपटारा किया जा चुका है। इसमें कुछ भावुक कर देने वाली समस्याएं भी आई हैं।
प्रश्न : अग्निवीर भर्ती योजना को आप कैसे देखते हैं, यह कहा जा रहा है कि यह पेंशन बंद करने की योजना है ?
अग्निवीर जिस भी क्षेत्र में जाएंगे समाज में बड़ा बदलाव लाएंगे। सेना में उन्हें अनुशासन और राष्ट्र निर्माण का प्रशिक्षण दिया जाएगा। सिपाही से लांस नायक बनने वाले जहां टीम लीडर की भूमिका में होंगे, वहीं अन्य समाज में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़कर बदलाव लाएंगे।