एक तरफ पहाड़ों को बेहतर सुविधाएं देने का दावा है, तो दूसरी तरफ सरकारी कर्मचारी ही पहाड़ चढ़ने के लिए तैयार नहीं है। डाक्टरों और शिक्षकों को पहाड़ चढ़ाने के लिए सरकार की अब तक की हर कोशिश नाकाम ही होती नजर आ रही है। इसका फर्क पहाड़ों के युवाओं के भविष्य पर भी पड़ रहा है और नतीजा है कि पहाड़ की पहले से कम आमदनी में और कमी हो रही है।
2014 के आर्थिक सर्वे से 2017-18 में हुए अध्ययन से यह भी सामने आया है कि प्रदेश में नियमित रूप से काम करने वाले कर्मियों की संख्या में इजाफा हुआ है। प्रदेश में युवाओं का रुझान भी स्वरोजगार की बजाय नियमित रूप से वेतनभोगी होने पर अधिक है। छोटा राज्य होने के कारण प्रदेश में सरकार भी एक बड़े नियोक्ता के रूप में सामने आई है।
प्रदेश सरकार खुद स्वीकार कर रही है कि करीब 50 हजार पद खाली है। इतना होने पर भी सरकारी कर्मचारियों को पहाड़ पर चढ़ाने में सफल होती नहीं दिख रही है। हाल ये है कि पर्वतीय जिलों मेें स्वास्थ्य कर्मियों, शिक्षकों की बेहद कमी है। खुद सरकार के मुताबिक पहाड़ में ही करीब 2400 से अधिक एकल विद्यालय हैं। इसका मतलब ये हुआ कि ये विद्यालय केवल एक ही शिक्षक के भरोसे हैं।
डाक्टरों के करीब 800 से अधिक पद खाली है। अर्थशास्त्री आदित्य गौतम के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों के पर्वतीय क्षेत्रों में न रहने से क्षेत्र की आर्थिकी भी प्रभावित होती है। कारण यह भी है कि शिक्षक, चिकित्सक सहित अन्य सरकारी कर्मचारियों की क्रय क्षमता अधिक होती है। कर्मचारी पहाड़ में पहुंचेंगे तो खर्च करेंगे और इससे किसी न किसी रूप में आर्थिक स्तर पर प्रभाव पड़ेगा। सरकारी कर्मियों को पहाड़ चढ़ाने की खासी कोशिश भी हुई है।
शिक्षा विभाग ने तबादला अधिनियम बनाया ताकी शिक्षकों को दुर्गम और अति दुर्गम विद्यालयों में भेजा जा सके। इसी तरह डाक्टरों को पहाड़ चढ़ाने के लिए बाकायदा बांड भरवाए गए। चिकित्सकों का कहना है कि पहाड़ में अवस्थापना सुविधाओं की कमी है। अस्पताल पुरी तरह से सुसज्जित नहीं हैं। दूसरी ओर, शासन से सीधे रूबरू होने का वास्ता देकर निदेशालयों, कैंप कार्यालयों को भी देहरादून ही शिफ्ट किया जा रहा है। कृषि निदेशालय के पौड़ी शिफ्ट करने को लेकर खासा बवाल भी हुआ।
प्रदेश में 12 प्रतिशत रोजगार देती है सरकार
प्रदेश के रोजगार बाजार में इस समय सरकार की करीब 12 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। आर्थिक रिपोर्ट के मुताबिक इस समय प्रदेश में वर्किंग जनसंख्या करीब 29.8 लाख के आसपास है। इसमें से करीब 3.50 लाख सरकारी कर्मचारी हैं।
50 प्रतिशत पलायन रोजगार के लिए
नियोजन विभाग की ओर से हाल ही में किए गए अध्ययन से जाहिर हुआ है कि प्रदेश में रोजगार का अभाव ही पलायन का सबसे बड़ा कारण है। पलायन आयोग के अध्ययन से भी यही जाहिर हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक रोजगार की कमी 50 प्रतिशत, स्वास्थ्य और बेहतर शिक्षण केंद्रों के अभाव के कारण 17 प्रतिशत, सड़क, बिजली, पानी की कमी के कारण 4 प्रतिशत, मानव वन्यजीव संघर्ष के कारण पांच प्रतिशत लोग मूल स्थान से पलायन कर रहे हैं।