2013 की केदारनाथ आपदा के बाद प्रदेश में जीईपी पर बात होनी शुरू हुई थी। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने नोबल पुरस्कार विजेता सुरेश पचौरी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन भी किया था। इस समिति की बैठकें भी हुईं, लेकिन फिर मामला ठंडे बस्ते में चला गया। लेकिन हैस्को के संस्थापक निदेशक पद्मभूषण डॉ.अनिल जोशी की ओर से कोशिश जारी रही।
ग्रीन जीडीपी से अलग है जीईपी
प्रदेश के कुल उत्पादन से पर्यावरण को हुए नुकसान को घटाने पर जो सामने आएगा वह ग्रीन जीडीपी है। जीईपी में पर्यावरण के घटक हवा, पानी, मिट्टी आदि में एक साल में हुए सुधार का आकलन किया जाना है। साफ है कि जीईपी यह बताएगी कि प्रदेश ने पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों का उपयोग करने में पारिस्थितिकीय तंत्र (मिट्टी, हवा, पानी और जंगल के आपसी संबंध की पूरी व्यवस्था) का नुकसान घटाने में कितना काम किया।
जीईपी में इनका होगा आकलन
जंगल - वन आवरण, वन क्षेत्र, नया पौधरोपण, पौधों के जीवित रहने की दर, जैव विविधता, वन उपज।
पानी - प्रदूषण, पानी की मात्रा, कितना पानी रिचार्ज किया गया, बारिश का पानी कितना बचाया गया, भूजल, प्राकृतिक जल स्रोतों को कितना रिचार्ज किया गया।
हवा - प्रदूषण कितना कम हुआ, हवा की गुणवत्ता, हवा में पीएम 10, पीएम 5 आदि सूक्ष्म कणों की मात्रा आदि।
मिट्टी - कितने हानिकारक तत्व कम हुए, मिट्टी की गुणवत्ता, सतह की मिट्टी की गुणवत्ता और गहराई, वन भूमि की मिट्टी की गुणवत्ता।
जीईपी पर कांसेप्ट नोट तैयार होने के बाद यह तस्वीर और खुलकर सामने आएगी। फ्रेमवर्क हैस्को ने तैयार कर लिया था। प्रदेश का नियोजन विभाग भी अब इस मुहिम में शामिल है। केंद्र सरकार और विशेषज्ञों का भी सहयोग मिल रहा है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य होगा जो सफलतापूर्वक इस अवधारणा को लेकर आएगा।
- पद्मभूषण डॉ.अनिल जोशी, संस्थापक निदेशक हैस्को