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आपदाः पीड़ितों को परेशान कर रही बहुगुणा सरकार

Thu, 02 Jan 2014 09:44 AM IST
अमर उजाला, उत्तरकाशी / अगस्त्यमुनि
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विस्थापन और पुनर्वास के लिए सरकार को जगाने के लिए आपदा प्रभावितों ने अनोखा तरीका अपनाया। क्षेत्र के आपदा पीड़ितों ने साल की अंतिम रात खेल मैदान में टेंटों में गुजारी।
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आपदा को बीते छह माह
केदारघाटी विस्थापन एवं पुनर्वास संघर्ष समिति के बैनर तले अगस्त्यमुनि खेल मैदान में आपदा पीड़ित एकत्रित हुए। टेंट लगाकर वहां रात गुजारी। इस मौके पर उन्होंने कहा कि आपदा को छह माह हो गए हैं।

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समिति के अध्यक्ष अजेंद्र ने आरोप लगाया कि सरकार आपदा पीड़ितों की नहीं सुन रही है। उल्टे उनको परेशान करने के लिए शरारती तत्वों का इस्तेमाल कर रही है।

विस्थापन और पुनर्वास के नाम पर केवल बयानबाजी हो रही है। यदि अब तक सरकार पीड़ितों को एकमुश्त आर्थिक मदद दे देती, वह अपने स्तर से आशियाने बना सकते थे। सरकार की बेरुखी के कारण लोगों को साल की विदाई और नए साल का स्वागत टेंटों में रहकर करना पड़ रहा है।
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इस मौके पर समिति के अध्यक्ष अजेंद्र अजय, डॉ. योगंबर नेगी, विश्वनाथ, महिपाल बड़वाल, महिपाल रावत, मनोज रावत, मनोज नेगी आदि शामिल थे। इस अवसर पर केदारनाथ आपदा पर लिखी गई पुस्तक दस्तक भी जारी की गई।

सरकार आपदा पीड़ितों की नहीं सुन रही
स्थानीय गायक धर्मदास ने आपदा पर लिखे स्वचरित गीत सुनाए। इस मौके पर कुछ लोगों ने आपदा पीड़ितों के कार्यक्रम में हुड़दंग मचाया। इस पर पुलिस अधीक्षक बीजे सिंह ने कहा कि संबंधित चौकी प्रभारी घटना की पूरी जानकारी ली जाएगी।

जून माह की आपदा में नौलुणा झूला पुल तथा हाईवे ध्वस्त होने से करीब 65 लाख की फसल खेतों में ही सड़ने की बर्बादी देख चुके स्याबा, सालू आदि गांव के लोग इस वर्ष भी स्थिति में कोई सुधार न देख परेशान हैं।

पुल का प्रस्ताव सर्वेक्षण से आगे नहीं बढ़ा
अभी तक इन गांवों को जोड़ने के लिए पुल का प्रस्ताव सर्वेक्षण से आगे नहीं बढ़ पाया है और ग्रामीण सौम्य काशी रोटरी क्लब के सहयोग से बनी ट्राली के सहारे और गाड़-गदेरे पार कर रहे हैं।

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स्याबा गांव के 125 से अधिक परिवारों की आजीविका सब्जी, ककड़ी, आलू आदि नकदी फसलों पर टिकी है। इस वर्ष जून की आपदा में ग्रामीणों की 3.298 हेक्टेयर खेती की जमीन मय फसल तबाह हो गई, जो फसल बची भी वह नौलुणा पुल और गंगोत्री हाईवे का बड़ा हिस्सा ध्वस्त होने के कारण बाजार तक नहीं पहुंच सकी।

ट्राली ही आवाजाही का इकलौता साधन
स्थिति यह है कि नौलुणा पुल पार करने के लिए ट्राली ही आवाजाही का इकलौता साधन है, लेकिन यह जोखिम भरा होने के कारण ग्रामीण आठ किमी जंगलों का रास्ता तय कर मनेरी पहुंचने को मजबूर हैं।

इस रास्ते पर भी आंद्रीगाड पर पुल न होने से ठंडे पानी में घुसकर नदी पार करनी पड़ रही है। सौरा गाड पार करने में भी यही दिक्कत है। इन रास्तों से खच्चर का ढुलान भाड़ा 500 रुपए देकर जरूरत का सामान गांव पहुंचाना पड़ रहा है।

निगम ने काटी आपदा पीड़ितों की बिजली
एक तरफ सरकार जहां आपदा पीड़ितों के बिजली बिल माफ करने की बात कह रही है, वहीं दूसरी ओर जल विद्युत निगम की मनेरी कालोनी में रह रहे डिडसारी गांव के 12 प्रभावित परिवारों के बिजली कनेक्शन काट दिए गए।

चार दिनों से अंधेरे में रह रहे प्रभावितों ने डीएम से बिजली सुविधा बहाल के लिए गुहार लगाई है। बीते साल 17 जून को भागीरथी में आई बाढ़ से डिडसारी गांव में कई घर बाढ़ की भेंट चढ़ गए थे, जबकि कई घर कटाव की वजह से खतरे की जद में आ गए थे।

रिफ्यूजियों की तरह रहने को मजबूर
प्रशासन ने बेघर हुए परिवारों को मनेरी स्थित जल विद्युत निगम की कॉलोनी में शिफ्ट किया। अभी तक सिर छिपाने के लिए छत का इंतजाम नहीं होने से ये प्रभावित अब भी कॉलोनी में ही रिफ्यूजियों की तरह रहने को मजबूर हैं।

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जिलाधिकारी श्रीधर बाबू अद्दांकी से गुहार लगाने पहुंचे प्रभावित बृजलाल, केदार सिंह, सुरेश, दिनेश आदि ने बताया कि डीएम ने बिजली जोड़ने का आश्वासन तो दिया, लेकिन निगम के अधिकारी बिजली जोड़ने से इंकार कर रहे हैं।

इस संबंध में निगम के डीजीएम जेबी सिंह ने कहा कि फिलहाल मेरे संज्ञान में यह मामला नहीं है। जानकारी जुटाकर कार्रवाई की जाएगी। यदि वे वास्तव में आपदा पीड़ित परिवार हैं तो उनकी बिजली जोड़ दी जाएगी।
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