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फौजियों को रिझाने को सरकार ने चला सियासी दांव

Wed, 24 Feb 2016 09:39 AM IST
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के अपनी अलग सैनिक कल्याण परिषद के ढांचे पर केंद्र की पटकनी के बाद सरकार भले बैकफुट पर आई, लेकिन राज्य में दस फीसद से अधिक पूर्वसैनिक व आश्रितों के वोटों को रिझाने के लिए सलाहकार परिषद का दांव खेला है।
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उत्तराखंड पहला प्रदेश है जिसके रैज्य सैनिक बोर्ड के लिए लंबी चौड़ी सलाहकार परिषद रहेगी। इस सलाहकार परिषद के बहाने सरकार रिटायर सैन्य अधिकारियों को एडजस्ट करने का विकल्प खुला रख रही है। इसका इस्तेमाल सरकार चुनाव में सैनिकों और पूर्वसैनिकों के बीच अपना सीधा दखल रखने के लिए करेगी।

राज्य सैनिक कल्याण परिषद पर केंद्र की बात मानकर सरकार ने फंड बचाने के साथ अपनी समानांतर परिषद भी चलानी शुरू कर दी है। पूर्व सैनिकों और अर्द्धसैनिकों को रिझाने के लिए चाय पर चर्चा से सीएम ने शुरुआत की थी। इस बैठक के बाद अद्ध्रसैनिकों के कल्याण के लिए अलग निदेशालय बनाने और कैंटीन लाभ के आदेश जारी किये। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते सलाहकार परिषद बनी है।
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ऐसी परिषद किसी अन्य राज्य में काम नहीं कर रही ऐसे में सरकार कांग्रेस से फौजियों को जोड़ने के लिए इस संस्था का इस्तेमाल कर सकती है। लेफ्टिनेंट जनरल गंभीर सिंह नेगी (रि) की अध्यक्षता वाली उत्तराखंड राज्य पूर्व सैनिक कल्याण सलाहकार परिषद में 6 अपर सचिव सदस्य और 6 सैन्य अधिकारी विशेष आमंत्रित सदस्य रखे गए हैं।

इसके अलावा पूर्व सैनिकों के 6 नामित सदस्यों का प्रावधान भी रहेगा। सरकार ने इसकी शुरूआत परिषद में बतौर उपाध्यक्ष कर्नल सत्यपाल सिंह गुलेरिया (रि) को सलाहकार समिति में उपाध्यक्ष नामित भी कर दिया है।

परिकर का पत्र भी है बाकी
सरकार ने रक्षा मंत्रालय के राज्य सैनिक कल्याण परिषद के अनुरूप तो कार्यवाही कर दी है, लेकिन नवंबर 2015 को रक्षा मंत्री मनोहर परिकर का सीएम हरीश रावत के नाम जो पत्र आया था उसपर काम होना बाकी है। परिकर ने अपने पत्र में सैनिक कल्याण निदेशक के वर्ष 2010 से नियुक्ति नहीं करने और सैनिक कल्याण निदेशालय में तैनात कर्मचारियों की वेतन विसंगति को लेकर पत्र लिखा था। निदेशक की तैनाती की प्रक्रिया इसके बाद शुरू हुई है।

केंद्र के अल्टीमेटम पर झुकी सरकार
राज्य रक्षा मंत्रालय की गाइड लाइन को दरकिनार कर प्रदेश सरकार ने जिस राज्य सैनिक कल्याण परिषद का गठन किया था उसे भंग कर दिया। रक्षा मंत्रालय ने राज्य की मनमानी के बाद वार्षिक बजट में कटौती के आदेश दिए थे। अमर उजाला ने 19 नवंबर को प्रकाशित किया था कि केंद्र ने लेफ्टिनेंट जनरल गंभीर सिंह नेगी (रिटायर) की अध्यक्षता वाली सैनिक कल्याण परिषद को अवैधानिक करार दिया है।

देश में उत्तराखंड पहला राज्य है जिसने केंद्र के मानकों के विपरीत ढांचा बना दिया था। अब पुराने ढांचे को भंग कर फिर से मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली सैनिक कल्याण परिषद गठित करने का शासनादेश जारी किया है। हालांकि अपनी साख बचाए रखने के लिए प्रदेश सरकार ने जनरल गंभीर सिंह नेगी वाली परिषद को उत्तराखंड राज्य सैनिक कल्याण सलाहकार परिषद नाम दिया है, जिसका रक्षा मंत्रालय के समक्ष कोई वजूद नहीं है।

सितंबर 2015 में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य सैनिक कल्याण परिषद के अध्यक्ष पद को छोड़ दिया था और उस पर जनरल नेगी को अध्यक्ष और कैप्टन बलवीर सिंह रावत को उपाध्यक्ष बना दिया। शासन ने आदेश जारी करते हुए नया ढांचा गठित कर जनरल नेगी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया।

इसके बाद इस बदलाव को रक्षा मंत्रालय के केंद्रीय सैनिक बोर्ड को भेज दिया। रक्षा मंत्रालय ने 15 नवंबर को राज्य को कड़ी भाषा में पत्र भेजा, जिसमें केंद्रीय सैनिक बोर्ड ने सीएम या गवर्नर के अलावा इस पद पर किसी अन्य को नियुक्त करने को गाइड लाइन के खिलाफ बताते हुए सैनिक कल्याण को मिलने वाले 75 प्रतिशत वार्षिक फंड को रोकने का अल्टीमेटम दिया है।

सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास विभाग उत्तराखंड को केंद्रीय सैनिक बोर्ड से अधिष्ठान के कुल वार्षिक बजट का 75 प्रतिशत के अलावा सैनिक कल्याण विश्राम गृहों के निर्माण के लिए 50 प्रतिशत और रख रखाव के लिए प्रति विश्राम गृह 50 हजार रुपये मिलते हैं।

यह फंड मिलता है केंद्र से
- राज्य के अधिष्ठान के लिए 75 प्रतिशत - लगभग 13 करोड़
- प्रदेश के 27 विश्राम गृहों के वार्षिक रखरखाव को 13.5 लाख
- नए विश्राम गृहों के निर्माण के लिए पचास प्रतिशत फंड

जनरल नेगी का कद घटा
सरकार ने लेफ्टिनेंट जनरल गंभीर सिंह नेगी (रिटायर) को उत्तराखंड राज्य पूर्व सैनिक कल्याण सलाहकार परिषद का अध्यक्ष बना दिया है। यह परिषद सीएम की अध्यक्षता वाली परिषद की एडवाइजरी बॉडी होगी। इसके ढांचे में कोई बदलाव नहीं किया गया है। विशेष आमंत्रित सदस्यों में सबसे सीनियर सैन्य अधिकारी जीओसी उत्तर भारत एरिया होंगे, जबकि पहले जीओसी इन सी मध्य कमान को रखा गया था।
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