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उत्तराखंड सरकार को राज्य पक्षी मोनाल से मोह नहीं, आंकड़े कर रहे तस्दीक

Mon, 15 Oct 2018 03:16 PM IST
कालिका रावल, अमर उजाला, पिथौरागढ़
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MONAL
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मोनाल को उत्तराखंड गठन के बाद वर्ष 2000 में राज्य पक्षी का दर्जा तो दिया गया, लेकिन इसके बाद इसे भुला दिया गया। हालांकि 2008 में इसके संरक्षण की ओर सरकार का ध्यान गया और राज्यपक्षी की गणना कराई गई, लेकिन इसके बाद से इस प्रजाति की गणना नहीं हुई। इन 10 वर्षों के दौरान मोनाल की संख्या में अप्रत्याशित कमी आई है। इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, अवैध शिकार से लेकर मांसाहारी पक्षी तक वजह हैं।

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 हिमालयी रेंज में पाई जाने वाले पक्षियों की जिन आधा दर्जन प्रजातियों को दुर्लभ घोषित किया गया है, उनमें मुख्य रूप से वेस्ट्रन ट्रेगोफेन, चीड़ फीजेंट, संटायर ट्रेगोफेन और मोनाल शामिल हैं। सिंधु सतह से 13 हजार फुट की ऊंचाई पर पाए जाने वाले इस पक्षी को हिमालयी रेंज के सबसे सुंदर पक्षियों में एक माना गया है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी, मसूरी, केदारनाथ, पिथौरागढ़, टिहरी, बदरीनाथ, रामनगर, पौड़ी, बागेश्वर आदि के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इसके दर्शन होते हैं। मोनाल का जंतु वैज्ञानिक नाम लेफोफोरस इंपेजिनस है। जनवरी से मार्च तक इसके प्रजनन काल का समय होता है और इस समय की समाप्ति के बाद जुलाई में मादा मोनाल अंडा देती है।

एक माह में इसके बच्चे बाहर निकल आते हैं, लेकिन इसकी संख्या का पता लगाने के लिए राज्य गठन के आठ साल बाद उत्तराखंड सरकार के वन्य जीव संरक्षण बोर्ड ने पहली बार 2008 में मोनाल की गणना कराई थी। उस गणना में पूरे राज्य में इस दुर्लभ पक्षी की संख्या 919 पाई गई थी। कभी यह संख्या हजारों में हुआ करती थी। 2008 में सबसे ज्यादा केदारनाथ में 367 पक्षी देखे गए थे। उसके बाद अब तक मोनाल की दोबारा गिनती नहीं हो पाई है। इसकी संख्या में अप्रत्याशित कमी के पीछे जलवायु परिवर्तन, अवैध शिकार को बड़ा कारण माना जा रहा है। मांसाहारी पक्षी मोनाल के घोंसले में रखे अंडों को नष्ट कर देते हैं।
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राज्य पक्षी का दर्जा देने के बावजूद सरकार और वन विभाग ने इस पक्षी को बचाने के लिए किसी तरह की रुचि नहीं दिखाई। वन महकमे ने 2008 की गणना से सबक लेते हुए इसके बसेरों को विकसित करने का निर्णय जरूर लिया था लेकिन इस दिशा में अब तक कोई काम नहीं हुआ है।

हिमालय की तलहटी में समुद्री सतह से 13 हजार फुट की ऊंचाई पर जिस जगह यह पक्षी अपना बसेरा बनाता है, वहां पर जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फबारी में कमी आ रही है। इसीलिए इस पक्षी की संख्या में गिरावट आई है। दिसंबर में मुनस्यारी में विंटर बर्ड फेस्टिबल होना है। उस दौरान मोनाल की गणना कराने की योजना है।
- विनय भार्गव, प्रभागीय वनाधिकारी, पिथौरागढ़

डॉ. पाठक ने मोनाल को विशेष संदर्भ में लिया था 
कुमाऊं हिमालया के बारे में गहन अध्ययन कर चुके प्रख्यात इतिहासकार पद्मश्री डा. शेखर पाठक ने कुमाऊं की जैव विविधता का अध्ययन करते वक्त मोनाल को विशेष संदर्भ में लिया था। उन्होंने अपनी पुस्तक कुमाऊं हिमालया टैंपटेशन में भी उन्होंने इस खूबसूरत पक्षी का जिक्र किया है।

पक्षी : मोनाल
जंतु वैज्ञानिक नाम : लेफोफोरस इंपेजिनस
प्रवास : उच्च हिमालयी क्षेत्र 

रिवर ट्रेनिंग मद में सिंचाई विभाग को मिले 71 लाख रुपये
प्रदेश सरकार ने बाढ़ सुरक्षा कार्यों के तहत नदी, नालों से सिल्ट, मिट्टी आदि का निस्तारण करने के लिए रीवर ट्रेनिंग मद में सिंचाई विभाग को 71.20 लाख रुपये मंजूर किए हैं। पहली किस्त के रूप में 38.98 लाख रुपये अवमुक्त कर दिए हैं। रिवर ट्रेनिंग मद में मिली राशि से ऊधमसिंह नगर, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी में बाढ़ सुरक्षा के कार्य करने हैं। उत्तराखंड सरकार के अपर सचिव देवेंद्र पालीवाल ने प्रमुख अभियंता सिंचाई को भेजे पत्र में कहा कि रिवर ट्रेनिंग मद में विभिन्न प्रस्तावों को बाढ़ सुरक्षा कार्यों के लिए 71.20 लाख रुपये मंजूर किए हैं।

पहले चरण में 31 मार्च 2019 तक बाढ़ सुरक्षा से संबंधित काम पूर्ण करने के निर्देश दिए हैं। योजना के तहत ऊधमसिंह नगर के विकासखंड सितारगंज में बैगुल नदी से मिट्टी-सिल्ट हटाने के लिए 34 लाख, पिथौरागढ़ के मुनस्यारी विकासखंड के नाचनी कस्बे में हरड़िया नाले पर बने पुल के अपस्ट्रीम में भूस्खलन से आए मलबे को हटाने के लिए 27 लाख, उत्तरकाशी के चंदा डोखरी के बदौली नौगांव में बाढ़ सुरक्षा के लिए 9.91 लाख रुपये मंजूर हुए हैं। इसमें से पहले चरण में ऊधमसिंह नगर के लिए 15 लाख, पिथौरागढ़ के लिए 14.07 लाख, उत्तरकाशी के लिए 9.91 लाख रुपये अवमुक्त कर बाढ़ सुरक्षा कार्य शुरू कराने को कहा गया है।

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