उत्तराखंड शासन में बैठे कुछ लापरवाह अधिकारियों के चलते चीनी मिल के कर्मचारियों को दोहरा महंगाई भत्ता मिल गया, जिससे सरकारी खजाने को लगभग दस करोड़ की चोट पहुंची है। दरअसल, जीओ जारी करने में गलती करने की वजह से यह भारी-भरकम नुकसान हुआ है।
हाल ही में एयर टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) में वैट संबंधी छूट के शासनादेश में गलती के चलते जिस तरह सरकार को चार करोड़ से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा था, जीओ में गड़बड़ी का यह कुछ ऐसा ही अजीबोगरीब मामला है। एटीएफ का मामला अमर उजाला में उजागर होने के बाद इस जीओ में संशोधन करके सरकार ने इतिश्री कर ली, चार करोड़ के नुकसान के लिए न किसी से सवाल हुआ न दंड ही दिया गया। खबर है कि कुछ आला अधिकारियों को इस गड़बड़ी की जानकारी हो गई है, वे माथापच्ची कर रहे हैं कि इसका निराकरण कैसे हो?
जानकारी के मुताबिक, विधानसभा चुनाव का एलान होने से कुछ दिन पूर्व 29 दिसंबर 2016 को शासन ने सरकारी और सहकारी क्षेत्र की चीनी मिलों में कार्यरत करीब चार हजार कर्मचारियों के वेतन में 50 फीसदी महंगाई भत्ते का समायोजन करके वेतन जारी करने संबंधी आदेश किया था। यह आदेश पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व श्रम मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल और पूर्व गन्ना मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की कमेटी की सिफारिश पर किया गया था।
13 जून 2014 को हो चुका था मिलकर्मियों का वेतन पुनरीक्षण
घोटाला
गौरतलब है कि चीनी मिलकर्मियों का वेतन पुनरीक्षण 13 जून 2014 को हो चुका था, जिसके फलस्वरूप उन्हें महंगाई भत्ते का लाभ मिलना भी शुरू हो गया था। इसके बाद अब वेतन पुनरीक्षण की बारी नंबर वर्ष 2017 में आनी थी, मगर गन्ना एवं चीनी विभाग ने यह तथ्य कमेटी के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं किए।
नतीजा शासनादेश जारी कर दिया और गन्ना एवं चीनी विभाग ने इसे अक्षरंश: लागू कर दिया। लिहाजा कर्मचारियों को वर्ष 2015 और 2016, दो बार का महंगाई भत्ता मिल गया। मामला समझ में आने तक चीनी मिल कर्मचारियों के खाते में 10 करोड़ रुपये अधिक जा चुके थे। जानकार कहते हैं कि पूरा मामला लगभग चार हजार कर्मचारियों से जुड़ा है। कर्मचारियों को जो दोहरा लाभ दिया गया है, उसमें उनकी कोई गलती नहीं है। लिहाजा उसे वसूलना अब सरकार के लिए बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा होगा।
चीन मिल प्रबंधन से जुड़े कुछ लोगों ने बताया कि इस आदेश का पालन करने में जब चीनी मिलों पर अतिरिक्त भार पड़ने लगा तो उन्होंने इसकी पड़ताल शुरू की, पता चला कि कर्मचारियों को महंगाई भत्ते का दोहरा लाभ मिल रहा है। उनका दावा है कि उन्होंने यह बात अधिकारियों से कही तो पहले तो उनकी बात पर ध्यान ही नहीं दिया गया। जब ध्यान गया तो पता चला कि इस त्रुटि के चलते सरकारी खजाने को भारी-भरकम चोट लग चुकी है।
पता चला है कि आनन-फानन में मुख्य सचिव एस. रामास्वामी ने सोमवार को इस मुद्दे पर संबंधित विभागों से सूचना तलब की। बताया जाता है कि इस संबंध में सोमवार को एक उच्चस्तरीय बैठक भी हुई है। उस संबंध में जानकारी करने की कोशिश की गई मगर कोई ऑन रिकॉर्ड बताने को तैयार नहीं हुआ। गन्ना सचिव विनोद शर्मा ने माना कि जीओ में कुछ गड़बड़ हो गई है, अभी सब कुछ प्रीमेच्योर है। इस मामले में कमेटी की बैठक होनी है, जैसा होगा मुख्यमंत्री, गन्ना विकास मंत्री और श्रम मंत्री को अवगत कराया जाएगा।
गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर 478 करोड़ बकाया
sugar cane
- फोटो : amar ujala
प्रदेश की चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का 478 करोड़ रुपये बकाया पड़ा है, लेकिन इसके भुगतान के लिए सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं हो रहा है। शुक्रवार को संपन्न हुई कैबिनेट की मीटिंग में इस मामले को रखा जाना था, लेकिन वित्त विभाग की सहमति का हवाला देकर इसे ऐन मौके पर टाल दिया गया। यह हाल तब है जब भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में गन्ना किसानों को 15 दिनों के अंदर गन्ना मूल्य का भुगतान कराने का दावा किया है।
प्रदेश में चालू पेराई सत्र के दौरान चीनी मिलों में 31 मार्च तक 946 करोड़ रुपये के गन्ना की पेराई की गई है। किसानों को इसमें से 512 करोड़ रुपये का ही भुगतान किया गया है। इस लिहाज से चीनी मिलों पर चालू पेराई सत्र का लगभग 434 करोड़ रुपये बकाया है। इसके अलावा सरकारी और सहकारी क्षेत्र की चीनी मिलों पर पिछले सीजन का 44.54 करोड़ रुपये का बकाया भी पड़ा हुआ है। दोनों सीजन के बकाये को मिलाकर चीनी मिलों पर किसानों का लगभग 478.54 करोड़ रुपये बकाया है।
प्रदेश की आठ चीनी मिलों में से पांच में इस सीजन की पेराई बंद हो चुकी है। जिन पांच मिलों में पेराई बंद हुई है वह सहकारिता और सरकारी क्षेत्र से संबंधित हैं। इन पांच मिलों में से सितारगंज की चीनी मिल ने जनवरी माह के प्रथम सप्ताह तक का, बाजपुर चीनी मिल ने जनवरी के दूसरे सप्ताह तक का, नादेही की चीनी मिल ने दो फरवरी तक का, किच्छा की मिल ने पांच फरवरी और डोईवाला की चीनी मिल ने 25 जनवरी तक के गन्ना मूल्य का भुगतान किया है। सरकारी और सहकारी क्षेत्र की चीनी मिलों की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह सरकारी सहायता के बिना किसानों को गन्ना बकाये का भुगतान कर सकें।
गन्ना मंत्री के समक्ष उठ चुका है मुद्दा
गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग मंत्री प्रकाश पंत के सामने भी गन्ना बकाये का मुद्दा उठ चुका है। 25 मार्च को पंत ने विधानसभा में गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग की समीक्षा की थी। मंत्री ने अधिकारियों से गन्ना बकाये का भुगतान नहीं होने का कारण पूछा था। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि किसानों को जल्द से जल्द गन्ना मूल्य का भुगतान कराने की दिशा में कदम उठाएं।