उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे कितने होटल, आश्रम और ढाबे मौजूद हैं, इसकी कोई जानकारी राज्य सरकार के पास मौजूद नहीं है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) बीते कई सुनवाई से सभी संबंधित प्राधिकरणों से इसकी सूची मांग रहा है लेकिन अभी तक सरकार की ओर से कोई स्पष्ट जानकारी ट्रिब्यूनल के सामने नहीं दी गई है। इस बार एनजीटी ने मौजूद सभी काउंसिल को होटलों की सूची पेश करने के लिए आखिरी मौका दिया है। मामले की सुनवाई 28 सितंबर को होगी।
जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई की। ग्रीन पैनल ने सुनवाई के दौरान सरकार और उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से हरिद्वार में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और होटलों की संख्या को लेकर सवाल पूछा तो काउंसिल ने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।
वहीं, उत्तराखंड सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के काउंसिल आपस में ही इस बात को लेकर भी उलझ गए कि बिना अनुमति और आदेशों का उल्लंघन करने वाले होटलों पर कार्रवाई का अधिकार किसे है? उत्तराखंड सरकार की ओर से मौजूद काउंसिल ने कहा कि प्रदूषण बोर्ड को होटलों पर कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है।
जबकि प्रदूषण बोर्ड के काउंसिल ने कहा कि उन्हें कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। ग्रीन पैनल ने सभी काउंसिल से यह भी बताने को कहा है सूची देने के बाद वह यह भी बताएं कि कितने होटलों ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति हासिल की है।
होटलों से सीधे गंगा में जाता है अपशिष्ट
मालूम हो कि हरिद्वार में गंगा घाटों पर होटलों के जरिये सीधे सीवेज डिस्चार्ज की शिकायत को लेकर एनजीटी सख्त रवैया अपना रहा है। वहीं सरकार ने हाल ही में जो एक्शन प्लान पेश किया है उसके मुताबिक हरिद्वार में मौजूद एसटीपी की क्षमता डिस्चार्ज के मुकाबले काफी कम है। इसलिए होटल सीधे गंगा में डिस्चार्ज कर रहे हैं।