भागीरथी ईको सेंसिटिव जोन के जोनल मास्टर प्लान पर केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की आपत्ति के बाद कैबिनेट ने सख्त रुख अपनाया है। इस मामले में उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने के भी संकेत दे दिए हैं। जोनल मास्टर प्लान को उचित करार देते हुए टिप्पणी की गई कि हिमालयी राज्यों के साथ केंद्र दोहरा मापदंड अपना रहा है।
मुख्य सचिव एस. रामास्वामी की ओर से भागीरथी ईको सेंसिटिव जोन का मामला कैबिनेट के समक्ष टिप्पणी के लिए रखा गया था। कैबिनेट ने भागीरथी ईको सेंसिटिव जोन के जोनल मास्टर प्लान पर केंद्रीय मंत्रालय की आपत्ति पर खेद प्रकट किया।
साथ ही इस मामले को जोरदारी के साथ सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखने के लिए कहा गया। यह कहा गया कि या तो सभी परियोजनाओं को अनुमति दी जाए या फिर भी केंद्र राज्य को हो रहे नुकसान की प्रतिपूर्ति करे। हिमालयी राज्यों के साथ अपनाए जा रहे दोहरे मापदंडों की भर्त्सना की गई। यह भी कहा गया कि परियोजनाओं के जलाशय से जल सवंर्धन होता और ईको सिस्टम को लाभ पहुंचता है।
बाद में मुख्य सचिव एस. रामास्वामी ने पत्रकारों को बताया कि एक जुलाई, 2011 को 40 वर्ग किमी क्षेत्र ईको सेंसिटिव जोन में रहा है। 18 दिसंबर 2012 की अधिसूचना में इसे लगभग सौ गुना बढ़ाकर 4179.59 वर्ग किमी कर दिया गया। इस संबंध में विधानसभा ने 29 नवंबर, 2011 को शासकीय संकल्प पत्र सर्वसम्मति से पारित करके केंद्र सरकार को ईको सेंसिटिव जोन की कार्यवाही तत्काल प्रभाव से रोकने के लिए कहा गया था। 18 दिसंबर 2012 को ईको सेंसिटिव जोन को समाप्त करने के संबंध में शासन ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय वन, पर्यावरण मंत्रालय को पत्र भेजा था। उन्होंने बताया कि केंद्रीय एक्सपर्ट कमेटी ने जैसी शिथिलता के लिए केंद्रीय मंत्रालय से संस्तुति की थी उसी लिहाज से जोनल मास्टर प्लान तैयार किया गया है।
भागीरथी ईको सेंसिटिव जोन में 25 मेगावाट तक की जल विद्युत परियोजनाएं चालू करने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) हरी झंडी दे चुका है, लेकिन केंद्र सरकार इसे भी नहीं मान रही है। मुख्य सचिव एस. रामास्वामी ने बताया कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 25 मेगावाट तक जल विद्युत परियोजनाओं को व्हाइट श्रेणी में रखा है, जिनसे वायु और जल प्रदूषण नहीं होता है। इसके बावजूद केंद्र सरकार इन परियोजनाओं को अनुमति नहीं दे रही है।
इसके अलावा केंद्र ने हिमाचल प्रदेश के लिए चार जोन पास किए हैं। इन जोनों में स्लोप (ढलान) का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन भागीरथी ईको सेंसिटिव जोन के लिए 20 डिग्री ढलान की बंदिश लगा दी गई, जबकि राष्ट्रीय मानक कहीं अधिक है। स्टीप स्लोप के संबंध में देशभर में लागू इंडियन रोड कांग्रेस स्टैंडर्ड 73 को लागू किया गया है। इसी तरह भू-उपयोग परिवर्तन एवं स्टीप स्लोप के मानकों को भागीरथी ईको सेंसिटिव क्षेत्र में भी लागू किया जाना चाहिए।
मुख्य सचिव ने कहा कि राज्य ने पर्यावरण कानूनों का पालन करके ग्रीन कवर बढ़ाया है। केंद्र से ग्रीन बोनस के लिए अनुरोध किया जाएगा। अन्य हिमालयी प्रदेशों के ईको सेंसिटिव जोन में भू-उपयोग परिवर्तन राज्य सरकार स्तर पर किये जाने की व्यवस्था दी गई है। वेस्टर्न घाट, महाराष्ट्र और अन्य हिमालयी प्रदेशों के ईको सेंसिटिव जोन की अधिसूचनाओं के अनुरूप उत्तराखंड को छूट प्रदान की जानी चाहिए। भागीरथी एवं सहायक नदियों में जल विद्युत परियोजनाओं को स्थापित किए जाने की अनुमति दी जानी चाहिए।