राष्ट्रीय नदी गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। नमामि गंगे परियोजना के तहत इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं। इसी के तहत राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) के वैज्ञानिक ऋषिकेश से लक्सर (जिला हरिद्वार) तक जल की गुणवत्ता का अध्ययन करने में जुटे हुए हैं।
फिलहाल ऋषिकेश बैराज से भीमगोड़ा बैराज, हरिद्वार और लक्सर के बीच सात स्थानों से वैज्ञानिकों की टीम ने जल के नमूने लिए हैं। इनका एनआईएच की प्रयोगशाला में अध्ययन किया जा रहा है। टीम में शामिल वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आरपी पांडे और डॉक्टर राजेश सिंह ने बताया कि वैसे तो गंगा गोमुख से थोड़ा आगे निकलते ही प्रदूषित हो जाती है।
ऋषिकेश से हरिद्वार होते हुए लक्सर तक इसमें प्रदूषण की मात्रा बहुत अधिक है। लेकिन, जल में कई लाभकारी बैक्टीरिया भी हैं। वहीं आर्सेनिक, पारा, नाइट्रेट फास्फेट, शीशा समेत कई खतरनाक तत्व भी हैं। अध्ययन में पता लगाया जा रहा है कि जल में कौन-कौन से लाभकारी बैक्टीरिया हैं।
इसके बाद इसकी रिपोर्ट केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय को सौंपी जाएगी। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजेश सिंह ने बताया कि कुंभ के दौरान हरकी पेड़ी समेत हरिद्वार के विभिन्न घाटों और क्षेत्रों में जल की गुणवत्ता का भी अध्ययन किया जाएगा। इसमें पता लगाया जाएगा कि श्रद्धालुओं के स्नान से गंगाजल की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ता है?
ऋषिकेश से लक्सर के बीच गंगाजल के नमूनों का अध्ययन किया जा रहा है। फिलहाल ऋषिकेश बैराज, भीमगोड़ा बैराज, हरकी पैड़ी समेत सात स्थानों से नमूने लिए गए हैं। संस्थान की प्रयोगशाला में जल में पाए जाने वाले बैक्टीरिया और खतरनाक तत्वों के बारे में जानकारियां जुटाई जा रही हैं।
-
डॉ. आरपी पांडे, वरिष्ठ वैज्ञानिक राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान