राज्य गठन के आज 17 साल पूरे हो गए, लेकिन इन वर्षों में राज्य आंदोलनकारियों की भावना के अनुरूप न तो गैरसैंण राजधानी बनी और न ही अपनी बोली-भाषा गढ़वाली, कुमाऊंनी को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिल सका।
पहाड़ से पलायन रुके और पहाड़ की राजधानी पहाड़ में बने, अपनी बोली को पहचान मिले, इसे लेकर राज्य आंदोलनकारियों ने शहादत दी, लेकिन इन वर्षों में अपनी बोली को पहचान नहीं मिल पाई है।
जबकि मैथिली, बोडो और कोंकणी से कहीं अधिक लोग गढ़वाली एवं कुमाऊंनी बोलते हैं। 1560-1790 ईसवी तक सभी शासकीय कार्य इसी भाषा में होते थे। ताम्रपत्रों, शिलालेखों और सरकारी दस्तावेजों में इसके अभिलेखीय प्रमाण मौजूद हैं। सन 1905 में गढ़वाल यूनियन नामक संस्थान से तारादत्त गैरोला और विश्वंभर दत्त चंदोला ने गढ़वाली पत्रिका का संपादन शुरू किया।