फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

...खुद को साबित करने के लिए कांग्रेस को अब 2022 का इंतजार

Mon, 13 Jan 2020 03:59 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून

सार

  • कांग्रेस में 2017 में नेतृत्व परिवर्तन के बाद भी अंदरूनी खींचतान बरकरार
  • प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह की नई टीम भी नहीं हो पाई अभी घोषित 
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

विधानसभा चुनाव 2017 में मात्र 11 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस को अब 2022 का इंतजार है। पिछले तीन सालों की आपसी तकरार अभी बरकरार है। कांग्रेस अब नई टीम और भाजपा के खिलाफ बढ़ते जन आक्रोश को धार देकर सत्ता में वापसी की कोशिश में है।

विज्ञापन


वर्ष 2017 से पहले पार्टी ने 11 विधायकों के टूटने का दंश झेला था। राष्ट्रपति शासन के बावजूद सत्ता में वापसी ने पार्टी के इस दंश को कुछ हद तक कम किया, लेकिन विधानसभा चुनाव में उसका यह दर्द कई गुना बढ़ कर सामने आया। मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस नेता हरीश रावत दो विधानसभाओं से हारे और पार्टी मात्र 11 सीटों पर सिमट गई।

इस हार के दंश को पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन के जरिये बदलने की कोशिश की और प्रदेश कांग्रेस की कमान कांग्रेसी नेता किशोर उपाध्याय से छीनकर चकराता विधायक प्रीतम सिंह के हाथ में दे दी गई। पार्टी को मजबूत करने के लिए मैदान में उतरे प्रीतम सिंह को अंदरूनी खींचतान और किशोर की बनाई हुई जंबो कार्यकारिणी विरासत में मिली।
विज्ञापन


इसी विरासत का बोझ ढोते-ढोते तीन साल गुजर गए। निगम चुनाव में पार्टी ने हौसला दिखाया, पंचायत चुनाव में टक्कर दी, लेकिन लोक सभा चुनाव में धड़ाम हो गई। इसके बाद पिथौरागढ़ उपचुनाव में मयूख महर की अल्प सक्रियता के बाद भी पार्टी प्रत्याशी अंजू लुंठी का बेहतर प्रदर्शन जरूर प्रीतम को राहत दे गया।

विज्ञापन

कांग्रेस के सामने चुनौतियां मुंह बाएं खड़ी

इतना होने पर भी कांग्रेस के सामने चुनौतियां मुंह बाएं खड़ी हैं। प्रीतम पुरानी पीसीसी को भंग करने के एक माह बाद भी नई टीम की घोषणा नहीं कर पाए हैं। यही नई टीम है जिसके भरोसे उन्हें 2022 का चुनाव लड़ना भी है और पार्टी को लड़वाना भी है।

नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश का डट कर उनके साथ खड़ा होना उन्हें आश्वस्त कर सकता है, लेकिन प्रदेश कांग्रेस में जड़ जमाए बैठे हरीश रावत की नाराजगी उन्हें परेशान कर सकती है। पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया में छिड़े संग्राम से यह पुष्टि हो भी गई है कि प्रीतम के लिए समस्या और अधिक तीखी होकर उभरी है। हरीश कैंप के विधायक नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश की वजह से अधिक नाराज हैं। साफ है संतुलन साधने के लिए प्रीतम को तनी हुई रस्सी पर चलना होगा।

अब कांग्रेस की निगाह 2022 के चुनाव पर हैं। विधायक दल की बैठक से लेकर पार्टी बैठकों में 2022 के लिए जादुई आंकड़ा बार-बार उभर कर सामने आता है। प्रदेश भाजपा को ध्वस्त करने के लिए प्रीतम सिंह केंद्र और प्रदेश के मुद्दों के बीच भी संतुलन साधने की कोशिश में हैं। भारत बचाओ, संविधान बचाओ रैली के जरिये सीएए, एनआरसी जैसे मामलों में शक्ति प्रदर्शन करने के बाद भी उनके तरकश में महंगाई, बेरोजगारी, देवस्थानम् अधिनियम, एनसीसी अकादमी के शिफ्ट होने जैसे मुद्दे हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें