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उत्तराखंडः रूठने-मनाने में उलझी कांग्रेस की सियासत

Thu, 15 Dec 2016 10:42 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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यशपाल आर्य - फोटो : अमरउजाला
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उत्तराखंड के चुनावी प्रचार में प्रतिद्वंद्वियों को छकाने उतरी कांग्रेस अभी रूठने-मनाने के खेल में ही उलझी हुई है।
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कभी सरकार का कोई मंत्री रूठ रहा है तो कभी कोई पूर्व विधायक। खुद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय  पीडीएफ को ज्यादा तरजीह दिए जाने को लेकर सरकार से लंबे समय तक रूठे रहे। रूठने-मनाने के ये किस्से काशीपुर रैली की तरह कहीं सतह पर आ रहे हैं तो कहीं ये अंदर ही अंदर बड़ी पटकथा लिखने के संकेत दे रहे हैं। कांग्रेस के भीतर ऐसे कई अंतर्द्वन्द चल रहे हैं, जो आने वाले दिनों में पार्टी की दुविधा और बढ़ा सकते हैं।

बहरहाल, जहां तक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य के रूठने का प्रश्न है तो ये कोई पहली घटना नहीं है। सियासी जानकारों की माने तो कांग्रेस में अहम और रसूख की लड़ाई अपने चरम पर है। किसी भी दिग्गज को अपनी सियासी रियासत में दखल बर्दाश्त नहीं है। कुमाऊं मंडल में वरिष्ठ मंत्री डॉ. इंदिरा हृदयेश, यशपाल आर्य, केसी सिंह बाबा बड़े नाम हैं।
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लिहाजा कुमाऊं की सियासी सत्ता का परोक्ष संघर्ष इन्हीं दिग्गजों के बीच छिड़ा रहता है। पसंद के अफसरों की तैनाती, पसंद के लोगों को संगठन व सरकार में तरजीह और अब विधानसभा चुनाव में पसंद के लोगों को टिकट दिए जाने के लिए दिग्गजों के बीच स्पर्धा छिड़ी है। संगठन और सरकार की ओर से किसी एक दिग्गज को तरजीह दिए जाने का मतलब है दूसरे का रूठ जाना।

राज्य सभा जाने से चूके किशोर उपाध्याय की नाराजगी भी किसी से छुपी नहीं है। पीडीएफ को लेकर उनकी सरकार से ठनी है। जानकारों का कहना है कि पीडीएफ में भी वह कैबिनेट मंत्री दिनेश धनै को लेकर असहज हैं। पूर्व कैबिनेट मंत्री शूरवीर सिंह सजवाण सीएम से इसलिए रूठे हैं, क्योंकि उन्हें मंत्री प्रसाद नैथानी को तवज्जो दिया जाना फूटी आंख नहीं सुहा रहा है।

अपनी नाराजगी वह संगठन की एक बैठक में यह कहकर जता चुके हैं कि 2002 में उन्हें टिहरी से जिलाबदर किया गया और तब से वह भटक ही रहे हैं। पार्टी के पूर्व विधायक केदार सिंह रावत की नाराजगी पीडीएफ के मंत्री प्रीतम पंवार को लेकर है। सरकार में प्रीतम को तरजीह दिए जाने से क्षुब्ध केदार सिंह को पार्टी ने भाजपा में शामिल होने से बड़ी मुश्किल में रोका है। मगर चुनाव आते-आते उनकी नाराजगी क्या गुल खिलाएगी, कोई नहीं जानता।

कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र भंडारी के रूठने की भी चर्चाएं हवा में तैर रही हैं। बताते हैं कि पार्टी की हाल ही में घोषित दो अहम समितियों में नजरअंदाज किए जाने से वे नाराज हैं। पार्टी अब उनकी नाराजगी दूर करने की कवायद में जुटी है। पार्टी के वरिष्ठ मंत्री प्रीतम सिंह, जिलाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर पार्टी फोरम पर संगठन से खुलकर विरोध जता चुके हैं।
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पिथौरागढ़ पार्टी विधायक मयूख महर ने तो सरकार का दायित्व ही नहीं स्वीकारा। ऐसे में जब मुख्यमंत्री हरीश रावत यह कहते हैं कि बड़ी पार्टी में बर्तन तो खटकते ही हैं और वह बड़ा भाई होने के नाते छोटे भाइयों को मनाने का हुनर जानते हैं तो सवाल उठता है कि भाजपा भी तो बड़ी पार्टी है, लेकिन वहां रूठने-मनाने के किस्से सतह पर नहीं है। सियासी प्रेक्षकों की निगाह में चुनाव से पूर्व ऐसी घटनाएं सियासी बुद्धिमानी नहीं है, इससे पार्टी की कठिनाइयां बढ़ सकती हैं।

- किशोर उपाध्याय इसलिए रूठे कि सीएम रावत उनके धुर विरोधी दिनेश धनै को तरजीह दे रहे थे
- कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य की नाराजगी उन्हें तरजीह न दिए जाने और बेटे के टिकट को लेकर 
- पूर्व में कैबिनेट मंत्री डॉ. इंदिरा हृदयेश रूठी तो इसे उनके पसंद के अफसर के ट्रांसफर से जोड़कर देखा गया
- चुनाव समिति व घोषणा पत्र समिति में नजरअंदाज किए जाने से कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र भंडारी रूठ गए
- पूर्व कैबिनेट मंत्री शूरवीर सजवाण पीडीएफ मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी को लेकर रूठे हैं
- मयूख महर की सरकार से नाराजगी पहले दिन से रही और उन्होंने दायित्व नहीं लिया
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