ग्रोस एन्वायरमेंट प्रोडक्ट (जीईपी) के विजन को सबसे पहले 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने स्वीकार किया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के लिए अलग से बजट की वकालत भी की। पूरे एक दशक के संघर्ष के बाद मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत और वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने जीईपी के प्रस्ताव पर मुहर लगाई।
हर मुख्यमंत्री ने भरी हामी
प्रदेश में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की, दोनों दलों के ज्यादातर मुख्यमंत्रियों ने जीईपी पर अपनी हामी भरी। लेकिन इसे लागू करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया जा सका। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. निशंक के बाद विजय बहुगुणा, हरीश रावत और त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी जीईपी को महत्व को समझा मगर निर्णय लेने से पहले वह सत्ता से विदा हो गए।
उत्तराखंड में सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) की मांग लंबे समय से की जा रही थी। हमने इस पर्वतीय राज्य के लिए हमेशा इसका समर्थन किया। इससे इस हिमालयी राज्य के पर्यावरण को बड़ी ऑक्सीजन मिलेगी। इसके साथ ही मैं यह भी कहना चाहूंगा कि पृथ्वी के तृतीय ध्रुव के समान हिमालय पर्वत को सभी प्रकार की राजनीतिक, सैनिक अथवा अन्य रूप से पर्यावरण के लिए हानिकारक गतिविधियों से मुक्त रखा जाना चाहिए। केवल वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए इसका उपयोग किया जाना चाहिए।
- प्रो. धीरेंद्र शर्मा, जेएनयू से रिटायर्ड प्रोफेसर एवं हिमालयी पर्यावरण मामलों के जानकार
यह स्वागत योग्य फैसला है। अब देखना होगा कि जीडीपी में जीईपी किस तरह योगदान देगा। राज्य के वन ऑक्सीजन का उत्पादन कर रहे हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर रहे हैं। इसके अलावा नदियां डाउन स्ट्रीम राज्यों को पानी उपलब्ध करा रही हैं। हमें इन पर्यावरणीय समर्थन के लिए उपयोगकर्ताओं से मौद्रिक मुआवजा मिलना चाहिए। पर्यावरण मानकों में सुधार के लिए राज्य को इसके लिए अत्यधिक प्रासंगिक चिंताओं जैसे जल संसाधनों का सूखना, जल प्रदूषण, मिट्टी के कटाव की जांच आदि पर बजट का एक हिस्सा देना चाहिए।
- डॉ. एके बियानी, डीबीएस पीजी कॉलेज के रिटायर्ड प्राचार्य एवं वरिष्ठ भूगर्भशास्त्री
यह निर्णय बहुत ही महत्वपूर्ण है, इसके लागू होने से पूर्व जीडीपी में इकोलॉजिकल बैलेंस को जितना महत्व मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाता था। जिसके कारण औद्योगिक घरानों को पर्यावरण संरक्षण को लेकर ज्यादा ध्यान नहीं देना पड़ता था। अब किसी भी योजना या उद्योग के विकास से पूर्व यह समीक्षा करनी जरूरी होगी कि योजना के क्रियान्वयन से पर्यावरण पर कोई विपरीत प्रभाव तो नहीं पड़ रहा है।
- प्रो. पंकज पंत, भूगर्भवेत्ता, प्राचार्य पीजी कॉलेज ऋषिकेश
राज्य योजना में जीडीपी के साथ अब सकल पर्यावरण उत्पाद जीईपी को भी आधार बनाए जाने से हिमालय के हिमायती और पर्यावरण प्रेमियों की जीईपी लागू करने की मांग पूरी होगी। इससे न केवल जीडीपी को बल मिलेगा, बल्कि राज्य में पर्यावरण और हिमालय के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण मदद मिलेगी। योजनाओं के निर्माण से पूर्व पर्यावरण संतुलन के पक्ष की भी समीक्षा करनी होगी।
-विनोद जुगलान, पर्यावरणविद एवं प्रांत पर्यावरण प्रमुख शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास