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जानिए, दस साल बाद कैसा होगा उत्तराखंड

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कैसा होगा 2025 का उत्तराखंड। जन्म के 14 साल बाद प्रदेश के लिए यह सवाल उठना विशेषज्ञ बेहतर भी मान रहे हैं और चिंताजनक भी।
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बेहतर इस नजरिये से कि प्रदेश अपने भविष्य के बारे में सोच रहा है। चिंताजनक इस नजरिये से भविष्य की यह तस्वीर स्पष्ट नही है। कुछ धुंधली और बहुत कुछ किंतु परंतुओं की है यह तस्वीर।

विकास के पैमाने पर उत्तराखंड बहुत अधिक आशान्वित नहीं करता तो ऐसे कारण भी सामने नहीं रखता कि चिंतित हुआ जाए। अगर विकास के पैमानों को जस का तस रखा जाए तो 2025 के आबादी करीब सवा करोड़ होगी। वर्तमान विकास दर करीब दस प्रतिशत है।
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इस विकास दर के हिसाब से प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) करीब 1.5 लाख करोड़ होगी। प्रति व्यक्ति आय भी बढ़कर करीब डेढ़ लाख हो जाएगी। हर घर में बिजली होगी और हर गांव तक सड़क। लोगों को घरों में ही पीने का पानी मिल जाएगा।

राज्य सरकारों की कोशिश रंग लाई तो शीतकालीन यात्रा केसाथ ही चार धाम यात्रा में लोगों की आवाजाही बन जाएगी। प्रदेश अपनी बिजली की जरूरत को पूरा करने के लिए बहुत हद तक अपना विद्युत उत्पादन दोगुना कर चुका होगा।

कम हो जाएगा पहाड़ का प्रतिनिधित्व

पर इससे इतर दूसरी तस्वीर भी है। 2025 में होने वाला परिसीमन पहाड़ से प्रतिनिधित्व और कम कर सकता है। इस समय हुए परिसीमन में ही पहाड़ और मैदान से प्रतिनिधित्व का अनुपात बदल गया। कारण यह भी रहा कि पहाड़ में जनसंख्या तेजी से कम हुई। पौड़ी ओर अल्मोड़ा में तो जनसंख्या का ग्राफ नकारात्मक ही हो गया।

यही ट्रेंड जारी रहा तो नए परिसीमन के बाद पहाड़ की राजनीति हाशिए पर होगी। पहाड़ में सुविधाओं का अभाव बढ़ेगा और मैदान और पहाड़ के बीच की खाई भी बढ़ जाएगी। पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या पांच लाख से बढ़कर आठ लाख हो सकती है।

सरकार खर्च कम न कर पाई और अपने संसाधनों में इजाफा न कर पाई तो अभी तक का राजस्व सरप्लस वाला बजट राजस्व घाटे में बदल सकता है। पूर्व मुख्य सचिव डॉ. आर एस टोलिया के शब्दों में आने वाले दस साल में सतत विकास और नगरीकरण की समस्या से पार पाना होगा। ऐसा न हुआ तो बुनियादी विकास पर असर पड़ेगा।

जलवायु परिर्वतन का यही हाल रहा तो पहाड़ आपदा के पर्याय होंगे। पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट के मुताबिक चाल खालों के सूखने और नदियों में पानी कम होने का असर सब पर एक साथ पड़ेगा। पहाड़ का जीवन और कठिन हो जाएगा।
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विशेषज्ञों का है कहना

कुल मिलाकर दो तस्वीर हमारे सामने हैं। एक चमकते हुए उत्तराखंड की और दूसरी धूमिल प्रदेश की। पर चमकते हुए प्रदेश को पाने के लिए कई कदम उठाने होंगे। सिर्फ चुनावी दायरे में बंधकर नीतियों को लागू करने की बजाय सतत विकास के मॉडल को अपनाना होगा।

सतत विकास का मॉडल अपनाएं
-नकारात्मक सोच क्यों रखीं जाए। पर चमकते हुए उत्तराखंड को पाने के लिए प्रदेश की सरकारों को कई काम करने होंगे।  राजनीतिक खेमेबंदी, संकीर्ण सोच छोड़नी होगी। चार बातें महत्वूपर्ण हैं। पहला सतत विकास। इसके लिए पर्यावरण संबद्ध सतत विकास का मॉडल स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना होगा।

दूसरा वैश्विक स्थिति को ध्यान में रखते हुए आपदा प्रबंधन का क्रियान्वयन। आपदा प्रबंधन राज्य की राजधानी से लेकर ग्राम स्तर तक प्रभावी हो। तीसरा जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए विकास योजनाएं बनें और चौथा बढ़ रहे नगरीकरण से जूझा जाए।
-डॉ. आरएस टोलिया, पूर्व मुख्य सचिव


हमारी विकास दर इस समय करीब नौ प्रतिशत है। विकास दर को हमे बढ़ाना होगा। दस साल बाद हम बेहतर स्थिति में होंगे अगर हम अवस्थापना पर बेहतर काम कर पाए। हयूमन डेवलपमेंट इंडेक्स के हिसाब से हमें अपनी आर्थिकी का आकलन करना होगा।
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