सेब व आलू की फसलों पर जोर देने के शानदार रहे थे नतीजे
बात जब पहाड़ी जिलों के विकास की हो तो हिमाचल के साथ तुलना लाजमी हो जाती है। हिमाचल में डॉ.वाईएस परमार के नेतृत्व में राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किया गया था और सेब व आलू की फसलों पर जोर देने के नतीजे शानदार रहे थे। वास्तव में पाठकों को यह जानकर हैरानी होगी कि सेब की वजह से किन्नौर और आलू के बीज की वजह से लाहौल स्पीति देश में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय वाले कृषि क्षेत्र के रूप में उभरकर सामने आए थे। किन्नौर में प्रति व्यक्ति आय दो लाख 20 हज़ार रुपये प्रति वर्ष है, जबकि बाकी पहाड़ी जिलों में यह एक लाख से भी कम है।
ये भी पढ़ें...Women Reservation: अध्यादेश के कवच से लैस होकर सुप्रीम जंग में उतरेगी राज्य सरकार, पढ़िए किसे बनाएगी आधार
क्या उत्तराखंड में हालात बदलने के लिए ऐसी ही असरदार नीति बन सकती है? एक अच्छा रास्ता यह हो सकता है कि सेब जैसे फलों की बागवानी का रकबा तेजी से बढ़ाया जाए। यहां नोट करना होगा कि हिमाचल में जहां सेब की बागवानी का रकबा सवा लाख हेक्टेयर है, वहीं उत्तराखंड में इसका रकबा बीस हजार हेक्टेयर मात्र है। मतलब विकास की गुंजाइश बहुत ज्यादा है। यहां रेखांकित करना जरूरी है कि श्री सुधीर चड्ढा जैसे बागवानी विशेषज्ञ इस विषय में कीमती सुझाव देते रहे हैं। इन दिनों सुधीर चड्ढा कुमाऊं में छोटे किसानों को घनी बागवानी परियोजनाओं के बारे में समझा रहे हैं ताकि आगे चलकर वे महंगी फसल वाले बड़े किसान बन सकें।
25वें वर्ष में पहाड़ी जिलों के किसान कितने खुशहाल होंगे
इन पंक्तियों का लेखक जब मिशन डायरेक्टर के रूप में हिमाचल के एक बागवानी मिशन पर गया था तो उसने देखा था कि राज्य सरकार का पूरा फोकस कृषि पर है। यह फोकस दरअसल डॉ.वाईएस परमार की प्रेरणा और व्यक्तिगत भागीदारी का नतीजा था। शायद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री धामी भी डॉ.परमार की नीतियों से प्रेरणा लेना चाहेंगे। अगर श्री धामी उत्तराखंड को सेब की बागवानी का एक बड़ा केंद्र बना दें तो उसी से तय होगा कि उत्तराखंड की स्थापना के 25वें वर्ष में पहाड़ी जिलों के किसान कितने खुशहाल होंगे।
( @Sanjeev Chopra:लेखक मसूरी की लाल बहादुर प्रशासनिक अकादमी के पूर्व निदेशक हैं और उन्हें उत्तराखंड प्रशासन के शीर्ष पदों का लंबा अनुभव है।)