साबिर पाक का 748वां उर्स उत्साह से मनाया जा रहा है लेकिन, कम ही लोग जानते हैं कि सब्र और इबादत की इंतहा का नाम ही साबिर पाक है। यही कारण है कि देश-विदेश से हर वर्ष लाखों जायरीन इबादत के लिए साबिर पाक की दरगाह पर आते हैं। अकीदतमंद साबिर पाक को पैदाइशी वली भी मानते हैं।
साबिर पाक का पैदायशी नाम अलाउद्दीन अली अहमद था। उनका जन्म करीब 807 वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हिरात शहर में
हुआ था। 12 वर्ष की उम्र में इनके वालिद अब्दुल्ला दुनिया से चले गए। उसके बाद गरीबी के चलते साबिर की तालीम के लिए
इनकी मां बीबी जमीला इन्हें पाकिस्तान के पाक पट्टन शरीफ में अपने भाई हजरत बाबा फरीद के यहां छोड़ आई।
कहते हैं बाबा फरीद ने साबिर को लंगर बांटने का हुक्म फरमाया ताकि उन्हें खाने की किसी तरह परेशानी न हो। इसके बाद मामा के कहे अनुसार अलाउद्दीन अली अहमद 12 वर्षों तक लंगर बांटते रहे लेकिन, खुद अन्न ग्रहण नहीं किया। उसके बाद जब अलाउद्दीन अली अहमद की वालिदा वापस अपने भाई के पास पहुंची तो बेटा सूखकर कांटा हो चुका था।
जब बेटे से इसका कारण पूछा गया तो उसने जो जवाब दिया वह सुनकर सभी दंग रह गए। उसने कहा कि मामू ने लंगर बांटने के लिए कहा था खाने के लिए नहीं। 12 साल तक भूखे रहकर लंगर बांटने के कारण बाबा फरीद ने अलाउद्दीन अली अहमद को साबिर का खिताब दिया। साथ ही अपना खलीफा यानी उत्तराधिकारी घोषित करते हुए रुड़की के समीप स्थित पिरानकलियर भेज दिया।
यहां भी साबित की जुबान से निकले लफ्ज पत्थर की लकीर बनने लगे। कलियर में साबिर ने इबादत की नई दास्तां लिखी। कलियर में जंगलों के बीच स्थित एक गूलर के पेड़ के नीचे साबिर ने इबादत शुरू की। वर्षों इबादत के कारण उनके शरीर पर दीमक लग गई। इस पर बाबा फरीद ने स्वयं के मुरीद होने आए बाबा शम्सुद्दीन को साबिर की सुध लेने के लिए कलियर भेजा। यहां आकर बाबा शम्सुद्दीन ने साबिर पाक की इबादत देखकर इन्हीं के मुरीद हो गए।
692 हिजरी 13 रवीउल अव्वल दुनिया से इनका पर्दा हो गया। उसके बाद शाह अब्दुल कुददूस गंगोई ने साबिर पाक के उर्स की शुरूआत की। इसके करीब 200 बरस बाद शाह अब्दुल कुददूस गंगोई ने साबिर पाक की मजार बनाकर सजदा शुरू किया और पहला उर्स मनाया। तब से यहां हर बरस सालाना उर्स का आयोजन होता आ रहा है।
उर्स में लगे 18 सीसीटीवी कैमरे बंद
कलियर में 15 दिनी उर्स मेले की सुरक्षा के लिए जिलेभर की खुफिया टीम और पुलिस प्रशासन को अलर्ट किया हुआ है। डीएम और एसएसपी कई बार बैठकें कर व्यवस्थाओं का निरीक्षण कर चुके हैं। नाभा जेल पर हुए हमले के बाद से आतंकियों की तलाश में कलियर के लिए विशेष रूप से भी हाईअलर्ट जारी किया हुआ है।
इसके बावजूद मेले में लगाए गए 18 सीसीटीवी कैमरे बंद पड़े हुए हैं। दरगाह प्रबंधन और पुलिस प्रशासन एक-दूसरे पर अव्यवस्था की जिम्मेदारी डाल रहे हैं। इस संबंध में जब क्षेत्रीय पुलिस अधिकारियों से बात की गई तो उनका कहना था कि दरगाह की ओर से बजट नहीं दिया गया है। इनकी मरम्मत करवाने की जिम्मेदारी दरगाह प्रबंधन की है।
उर्स मेले की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। मेले की संवेदनशीलता के साथ ही सुरक्षा की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उर्स के लिए एसपी देहात और पुलिस क्षेत्राधिकारी सहित अन्य पुलिस अधिकारियों को तैनात किया गया है। सुरक्षा के मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
- राजीव स्वरूप, एसएसपी हरिद्वार