जंगल के अंदर किन-किन पक्षियों, मेंढकों और दूसरे वन्य जीवों की प्रजातियां हैं? यह जानने के लिए अब घने वन के अंदर भटकने की जरूरत नहीं है। जंगल के कोलाहल और अलग-अलग स्वरों का अध्ययन करके यह पता चल जाएगा कि किस-किस प्रजाति के वन्य जीवों का जंगल में वास है।
इतना ही नहीं, वन्य जीवों के स्वर की फ्रीक्वेंसी उनका बर्ताव और मूड के बारे में भी बता देगी। इसके अध्ययन के लिए जूलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया में देश की पहली बायो एकॉस्टिक लैब स्थापित की गई है।
बायो एकॉस्टिक लैब की स्थापना से हिमालयी जंगलों में रह रहीं वन्य जीवों की प्रजातियों का पता लगाना आसान हो गया है। अभी तक विज्ञानी भटक कर इसका पता लगाते थे, लेकिन अब सिर्फ आवाज रिकार्ड करके लाना भर रहेगा। लैब में अध्ययन से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। हिमालयी वन्य जीवों की प्रजातियों का अभी तक पूरा आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन लैब से यह आंकड़ा तैयार किया जा सकेगा। इसमें पक्षियों, छोटे और बड़े सभी वन्य जीवों के स्वर का अध्ययन होगा।
विज्ञानियों का कहना है कि वन्य जीवों की आवाज की फ्रीक्वेंसी से उनकी प्रजाति पता चल जाएगी। इसके साथ ही यही फ्रीक्वेंसी यह भी बता देगी कि वन्य जीव किस मूड में है। जेडएसआई ने अभी तक विभिन्न प्रकार के पक्षियों की आवाज का अध्ययन किया है। विभिन्न मूड और स्थितियों में निकाले गए स्वर की फ्रीक्वेंसी भिन्न पाई गई। इसी तरह अब मेंढकों और छोटे जीवों के स्वर का अध्ययन किया जाएगा। अभी तक अमेरिका, ब्राजील समेत चुनिंदा देशों में बायो एकॉस्टिक लैब की स्थापना करके पक्षियों और दूसरे वन्य जीवों के स्वर का अध्ययन किया जा रहा है।
जेडएसआई में बायो एकॉस्टिक लैब की स्थापना से पक्षियों और दूसरे वन्य जीवों के स्वरों का अध्ययन किया जा सकेगा। इससे पक्षियों की प्रजातियों का ज्ञान होने के साथ उनके बर्ताव के संबंध में भी जानकारी हासिल की जा सकेगी।
- डा. अर्चना बहुगुणा, कार्यवाहक निदेशक, जूलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया