पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि संसद में कुछ अच्छे वक्ता हैं लेकिन वह अच्छी बहस नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री मोदी उनमें से एक हैं। वह अच्छे ढंग से बहस नहीं कर सकते क्योंकि वह सुनना नहीं चाहते। तरुण विजय ने भी कहा कि सुनने के लिए धैर्य होना आवश्यक है।
हर विरोधी को बोलने का मौका देते थे नेहरू
पूर्व राज्यसभा सांसद डीपी त्रिपाठी ने कहा कि जवाहर लाल नेहरू के समय विपक्ष के हर सदस्य को बोलने का पर्याप्त अवसर मिलता था। पिछले कुछ वर्षों में केवल भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों के सदस्यों को ही बोलने का अवसर दिया जाता है। मनोनीत सदस्यों की हालत तो बेहत खराब है। उन्हें महज दो मिनट का ही समय दिया जाता है। मनोज झा ने कहा कि नेहरू खुद भी संसद को पूरा वक्त देते थे। उनके बाद किसी भी प्रधानमंत्री ने संसद को इतना समय और महत्व नहीं दिया।
शालीन प्रवक्ताओं का दौर खत्म
मनोज झा ने कहा कि टीवी की बहसों ने शालीन प्रवक्ताओं का दौर अब खत्म कर दिया है। टीवी पर यह देखकर वक्ताओं को बुलाया जाता है कि वह कितना चिल्ला सकता है। दूसरे की बात को काटने, चिल्लाने और विवादास्पद बोलने के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। उन्होंने कहा कि टीवी बहसों में शामिल होने से उन्हें बीपी और शुगर की दिक्कत बढ़ गई है।
सबसे ज्यादा असहिष्णु पीएम थे नेहरू
तरुण विजय ने कहा कि जवाहर लाल नेहरू सबसे ज्यादा असहिष्णु प्रधानमंत्री थे। इस पर मनोज झा समेत अन्य सदस्यों ने विरोध जताया। झा ने कहा कि नेहरू के सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल से रिश्तों की गलत व्याख्या की जाती है। जयराम रमेश ने कहा कि नेहरू न केवल विपक्ष को महत्व देते थे। बल्कि प्रमुख विपक्षी नेताओं को सम्मान देते हुए उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी देते थे।