केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट में आर्थिक मंदी से बचने के उपाय किए गए हैं। सरकार का पूरा प्रयास है कि लोगों के हाथों में पैसा जाए ताकि वे ज्यादा से ज्यादा खर्च करें। ये उपाय बाजार में मंदी को तोड़ने में मदद करेगा। सरकार ने बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बड़ी धनराशि रखी है। इससे विकास की गति में तेजी आने के साथ आर्थिक प्रगति का रास्ता खुलेगा। केंद्र ने कृषि क्षेत्र पर खास फोकस किया है। सरकार को यह एहसास है कि वह कृषि क्षेत्र को मजबूती दिए बगैर आर्थिक संकट की चुनौती से पार नहीं पा सकेगी। इसलिए उसने कृषि क्षेत्र के खास योजनाओं की घोषणा की है।
अब तक सरकारों की यह सोच रही है कि राजकोषीय घाटा काबू से बाहर नहीं होना चाहिए। लेकिन पिछले काफी समय से अर्थशास्त्रियों की यह राय सामने आ रही थी कि सरकार को राजकोषीय घाटे में ढील देनी चाहिए। बजट में इस बार ये ढील दी गई। इससे पैसा आएगा। देश के पर्यावरण में हिमालय राज्यों का खास योगदान है। हमेशा की तरह वे केंद्र से पर्यावरणीय सेवाओं के बदले केंद्र से कुछ पाने की इच्छा कर रहे थे। लेकिन उत्तराखंड या हिमालय राज्यों का अलग से बजट में कोई जिक्र नहीं हुआ।
ऐसे लगा राज्यों को झटका
बजट के शोर में एक अहम बात शायद दब गई। ये बात करों में राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर है। शनिवार को 15वें वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट भी रखी गई। 14वें वित्त आयोग में राज्यों की करों में हिस्सेदारी 42 फीसदी थी। लेकिन 15वें वित्त आयोग ने इसे घटाकर 41 फीसदी करने की सिफारिश की है। केंद्र का तर्क है कि उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पैसा चाहिए। इसके अलावा वह जम्मू कश्मीर राज्य के कम हो जाने को भी आधार बना रहा है। - प्रोफेसर बीके जोशी, आर्थिक मामलों के जानकार एवं पूर्व कुलपति कुमाऊं विवि