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चित्रों के सहारे उत्तराखंड की संस्कृति को बचाने में जुटी ये बेटियां, पढ़कर आप भी करेंगे गर्व

Sat, 09 Sep 2017 08:44 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड राज्य को बने 17 साल बीत गए हैं, लेक‌िन विकास के नाम पर राज्य के संसाधनों का जमकर दोहन हुआ है। नतीजा ये रहा कि आज प्रदेश के पहाड़ पलायन के दर्द से कराह रहे हैं। आज पहाड़ के युवा पढ़ाई और रोजगार के ल‌िए पलायन करते जा रहे हैं। 
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आज पहाड़ों के हजारों गांव वीरान हो चुके हैं। लाखों घरों पर ताला लटक गया है और खेत बंजर पड़े हैं। लेक‌िन एक समय था जब पहाड़ के इन्हीं खेतों में पौष्ट‌िक अनाज उगाया जाता था। लेक‌िन आज लोग पहले के इन अनाज और व्यंजनों को भूलते जा रहे हैं। 

जबक‌ि इन अनाजों से बहुत ही कम समय में पौष्ट‌िक व्यंजन बनाए जा सकते हैं। इसके चलते उत्तराखंड की दो युवा महिलाओं ने ग्रामीण आबादी के बीच चित्र के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने का बीड़ा उठाया है। 
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जी हां, उत्तराखंड की च‌ित्रकार तान्या कोटनाला और पोषण विशेषज्ञ तान्या सिंह ने राज्य की स्थानीय कला और संस्कृति को पुनर्जीवित करने के इरादे से भुली फर्म(जिसका अर्थ गढ़वाली में 'छोटी बहन' है) के रूप में पिछले वर्ष बनाया था। 

तान्या स‌िंह का कहना है क‌ि उत्तराखंड पौष्ट‌िक आहार का उत्पादन करने वाला प्रदेश है। लेक‌िन यहां के लोग इतने जागरूक नहीं है। यहां के मौसमी फल और यहां के व्यजंन आज भी दादी की याद द‌िलाती हैं।

एक वेबसाइट को द‌िए इंटरव्यू में उन्होंने कहा क‌ि, एक बार यहां की स्‍थानीय सामग्री लुंगदी का नाम मेरे जहन में आया। मैने वहां लोगों से इसके बाद में पूछा तो न‌िराशा ही हाथ लगी। क‌िसी को इसके बारे में नहीं पता था। इसल‌िए मैनें उत्तराखंड की विभिन्न व्यंजनों में शोध किया ।
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इन सामग्रियों को  सब्जियों और मौसमी फसलों से तैयार किया जाता है।  यह फल और सब्ज‌ियां साल में एक बार ही म‌‌िलती हैं। इसल‌िए इन्हें संजो कर उनका और सही मात्रा में पोषण तत्वों को उपलब्‍ध कराना होता है। पोषण में पोस्ट ग्रेजुएकशन और खाद्य संचार में  कोर्स करने के बाद वह वापस लौटी हैं। वे प्रदेश की संस्कृत‌ि को दुन‌िया भर में पहचान द‌िलाना चाहती हैं। 

उन्होंने कहा क‌ि वे दोनों जल्द ही ग्रामीण और महिला विकास मंत्रालय के तहत राज्य सरकार के खाद्य और पोषण बोर्ड के सहयोग से परियोजनाओं में काम करेंगी। ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को मासिक धर्म की स्वच्छता और स्तनपान जैसे मुद्दों पर जागरूक कर सकें। 

तान्या का कहना है क‌ि विकसित शहरों में  मह‌िलाओं में स्तनपान का घटता स्तर एक दमदार विषय बना हुआ है। यह ग्रामीण महिलाओं में अध‌िक हो रहा है। कहीं न कहीं यह पोष्ट‌िक भोजन न म‌िलने के कारण भी हो रहा है। कहा क‌ि कला और च‌‌ित्रों के माध्यम से हम 500 से अधिक आँगनवाड़ी केंद्रों तक पहुंचकर जागरूकता फैलाएंगे।

तान्या ने बताया क‌ि अगस्त में राज्य सरकार के स्तनपान अभियान के तहत भुली ने भी काम क‌िया है। उसका उपयोग उत्तराखंड में लगभग 26,000 आंगनवाड़ी में जागरूकता फैलाने के लिए किया जा रहा है। कहा क‌ि स‌ितंबर के पहले सप्ताह को राष्ट्रीय पोषण सप्ताह के रूप में बनाया जाता है। इसल‌िए हमने यह जागरूकता अभ‌ियान स‌ितंबर में ही चलाने का फैसला ल‌िया है। 
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