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कहीं टीवी, इंटरनेट से बदल तो नहीं रहा आपके बच्चे का मन

Mon, 22 Jan 2018 03:21 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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कहीं टीवी और इंटरनेट आपके बच्चों का मन तो नहीं बदल रहा है। वो हिंसात्मक प्रवृत्ति की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं। कम से कम दून के मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक तो इसी ओर इशारा कर रहे हैं।

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अगर ऐसा है तो संभल जाइए। कहीं आपकी लापरवाही या सुस्ती किसी बड़े हादसे की वजह ने बन जाए। हरियाणा में एक छात्र के महिला प्रधानाचार्य को गोलियों से छलनी कर दिया। इससे पहले लखनऊ में एक छात्रा ने अपने स्कूल में एक बच्चे को चाकू से गोद डाला। स्कूलों में इस तरह की घटनाओं की वजह बच्चों का मन बदलना माना जा रहा है।

मनोचिकित्सकों का कहना है कि तेजी से बच्चे हिंसात्मक प्रवृत्ति के होते जा रहे हैं। छोटी बात पर भी बड़ी घटना सामने आ रही है। देहरादून में भी कुछ बच्चे ऐसी ही परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार टीवी, फिल्म, इंटरनेट बच्चों के कोमल मन पर हिंसा की इबारत लिख रहे हैं। बच्चे, किशोर हिंसा को अच्छा मान रहे हैं। बच्चों से लगातार संवाद करने के साथ कुछ सावधानी बरती जाएं तो असहज स्थितियों से बचा जा सकता है।
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टीवी करता है सोच को प्रभावित
सीबीएसई काउंसलर और न्यूरो साइकोलॉजिस्ट डॉ.सोना कौशल गुप्ता के मुताबिक सोच, विचार और व्यवहार वह तीन चीजें हैं, जिस पर सब कुछ निर्भर करता है। टीवी, इंटरनेट, वीडियो गेम बच्चों की सोच को प्रभावित करते हैं। फिर इन माध्यमों से मिली सोच से उनका विचार बनता है और अंत में वह व्यवहार के तौर पर सामने आता है। बच्चों से पहले अभिभावकों को यह समझना होगा कि कहीं वह बच्चों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर हिंसात्मक विचारों की तरफ तो नहीं धकेल रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास रोजाना 10 से 12 ऐसे मामले आ रहे हैं, जिन्हें साइकोथेरेपी से सुधारने का प्रयास किया जा रहा है। 

बच्चों के गुस्से को न नकारें
सीनियर क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट डॉ.वीना कृष्णनन के अनुसार सभी बच्चे गुस्सा करते हैं, तोड़फोड़ करते हैं, यह सोचकर स्थितियों को नकारना खतरनाक होता है। कई बच्चों में अटेंशन डिफिशिट हाइपर डिसआर्डर होता है, वो असहज हालात को उत्पन्न कर अपनी तरफ लोगों को ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करते हैं। वीडियो गेम, कार्टून, फिल्म में ‘हिट और स्कोर’ करने को सही बताया जाता है। यह सही नहीं है, इसे बच्चों को समझाने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि उनके पास रोजाना चार से पांच ऐसे मामले पहुंचते हैं, जिनमें माता-पिता की शिकायत होती है कि बच्चा बार-बार उत्तेजित हो जाता है।
 

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जितनी देर करेंगे, उतनी मुश्किल होगी

डॉक्टर - फोटो : amar ujala
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ.नंदकिशोर के अनुसार बच्चे मुश्किल में फंस रहे हैं। वहीं समस्या का हल करने की जगह अभिभावक मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक के पास जाने से बचते हैं। अगर वह आते भी हैं, तो बहुत सकुचाते हुए। उन्हें समझने की जरूरत है। जितनी देर करेंगे उतनी ही मुश्किल बढ़ेंगी। स्कूलों में भी काउंसलर को तैनात करने के बजाए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना होगा। 

इन लक्षणों को पहचानें
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बच्चों में ऑप्शन डिफेंट डिसआर्डर होता है। इसमें बच्चा क्रोधित होने के साथ बहस करता है। कहना नहीं मानता है। इसके बाद कंडक्ट डिसआर्डर की अवस्था आती है। यह डिसआर्डर केवल बच्चों और किशोरों में होता है। इसमें बच्चे का व्यवहार बहुत हिंसात्मक हो जाता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अलग-अलग बच्चों के लिए अलग-अलग इलाज का तरीका होता है।

अभिभावक इन बातों का रखें ध्यान
- फिल्म, टीवी, इंटरनेट पर दिखाई जाने वाली हिंसा का समर्थन न करें।
- बच्चों को हिंसा के  नुकसान के बारे में बताएं।
- धैर्य से बच्चे की बात को सुनें और कोई मान्यता न थोपें।
- अगर बच्चे में कोई मानसिक दोष नजर आ रहा है, तो मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक से सलाह लें।

इन बातों को शिक्षक न करें नजरअंदाज
- बच्चा स्कूल देर से पहुंच रहा हो।
- ज्यादातर समय वो गुमसुम सा रहता हो।
- व्यवहार में चिड़चिड़ापन और बातचीत में उग्र हो।
- सहपाठियों के साथ कम घुलता-मिलता हो।
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