ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन के लिए पहाड़ों को काटकर सुरंग बनाने में करोड़ों टन मलबा निकलेगा। लेकिन यह मलबा लोगों और पर्यावरण के लिए खतरा नहीं बनेगा।
इसके लिए विशेष योजना तैयार की गई है। मलबे के लिए विशेष डंपिंग साइट बनाई जाएंगी। डंपिंग साइट में पौधरोपण कर नया जंगल तैयार किया जाएगा। केंद्रीय वन मंत्रालय और निर्माण एजेंसी के अफसरों के अनुसार पर्यावरण संरक्षण व विकास कार्य दोनों कैसे साथ-साथ चल सकते हैं, इसके लिए यह परियोजना एक उदाहरण बनेगी।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग (सिमली) के बीच 126 किलोमीटर रेल लाइन बनना प्रस्तावित है। इसके अधिकांश हिस्से को पहाड़ों के अंदर सुरंग से होकर गुजरना है। केवल स्टेशन आदि मुख्य जगह ही भूमि के ऊपर होंगी। सुरंग बनाने से पेड़ों का कटान काफी कम होगा, केवल 18 हजार वृक्षों को ही काटा जाएगा। लेकिन, असली चुनौती सुरंग खोदने से निकलने वाले करीब 18 करोड़ टन मलबे (एक करोड़ घनमीटर) को लेकर है।
यह मलबा पर्यावरण आदि को नुकसान न पहुंचाए, इसके लिए रेल विकास निगम, आईआईटी रुड़की और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने विशेष योजना बनाई है। तय हुआ कि जहां से ट्रैक गुजर रहा है, वहां पर 31 खास तरह की डपिंग साइट बनाई जाएं। रेल विकास निगम के चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर हिमांशु बड़ौनी के अनुसार इन डंपिंग साइट का स्ट्रक्चर एक जैसे नहीं होगा। आईआईटी रुड़की के विशेषज्ञों ने भौगोलिक परिस्थितियों आदि का आंकलन कर साइट के हिसाब से अलग-अलग स्ट्रक्चर प्लान किया है।
एक करोड़ घनमीटर मलबे में से अनुमान है कि स्टेशन आदि के निर्माण, भरान आदि के काम में करीब 50 से 60 लाख टन का इस्तेमाल हो जाएगा। जो मलबा बचेगा, उनको डंपिंग साइट में रखा जाएगा। फिर डंपिंग साइट में पौधों को लगाकार हराभरा कर दिया जाएगा। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के वनाधिकारी अजय कुमार और डॉ. योगेश गैराला के अनुसार प्रयास किया गया है कि योजना से पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो।
563 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित होगी
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेले लाइन के लिए 563 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित होगी। इसके लिए रेल विकास निगम से 63 और 500 हेक्टेयर के दो-दो अलग प्रस्ताव तैयार किए थे। इसके हस्तांतरण के लिए केंद्रीय वन मंत्रालय ने सैद्धांतिक सहमति प्रदान दे दी है।
20 साल खनन के बराबर निकलेगा मलबा
प्रदेश में सबसे बड़ा खनन कुमाऊं मंडल की गौला नदी में होता है, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिले तक फैले खनन क्षेत्र में हर साल करीब 54 लाख घनमीटर खनिज निकाला जाता है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन योजना में निकलने वाले मलबे से तुलना की जाए, तो उसमें इतना मलबा निकलेगा जितना गौला में करीब बीस साल तक लगातार खनिज निकासी कर निकाला जाएगा।