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तंग आए हजारों किसानों ने छोड़ी खेती, बने मनरेगा मजदूर

Tue, 06 Feb 2018 06:43 PM IST
चंद्रेश पांडे/अमर उजाला, हल्द्वानी।
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फसलें सूख कर हो रही तबाह - फोटो : अमर उजाला
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जानवरों से तंग आए उत्तराखंड के हजारों क‌िसान खेती छोड़कर मनरेगा मजदूर बनने का मजबूर है। घरबार चलाने के ल‌िए उनके पास रोजी का एक मात्र जर‌िया खेती था, जो अब तेजी से उजड़ता जा रहा है। कई क‌िसानों ने केंद्रीय व‌ित्त मंत्री अरुण जेटली को पत्र ल‌िखा है क‌ि फसली बीमा मौसम आधार‌ित करने के बजाय नुकसान आधार‌ित करने की मांग की है।

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जंगली जानवरों से क‌िसान बहुत परेशान हैं। अकेले नैनीताल जनपद के एक ही ब्लाक में सात हजार से ज्यादा क‌िसानों ने मनरेगा के जॉब कार्ड बनाए हैं। जनपद के भीमताल, रामगढ़, धारी और ओखलकांडा विकासखंड फल और सब्जी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।
बेतालघाट में मिर्च का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। पिछले कुछ सालों में इन विकासखंडों में बंदरों और सूअरों का आतंक तेजी से बढ़ा है। दिन में बंदरों के झुंड और रात में सूअर फसलों को तहस-नहस कर रहे हैं। इस समस्या का समाधान न निकलने से काश्तकार खेती छोड़कर मनरेगा में मजदूरी करने को विवश हो गए हैं।
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कभी लहलहाती फसलें
काश्तकार बताते हैं कि दो साल पहले तक बेतालघाट ब्लाक के जोशीखोला, रोपा और चापड़ गांवों में गेहूं, गहत, मास, मिर्च और धान समेत कई फसलें लहलहाती थीं। जब से बंदरों और सूअरों का आतंक शुरू हुआ है तब से खेती नुकसान का सौदा साबित होने लगी।  

भारी नुकसान से छोड़ी खेती
खेती में लगातार नुकसान होता देख बेतालघाट के जोशीखोला निवासी दयाकिशन, पीतांबर, भुवन चंद्र, गोविंद बल्लभ, रोपा गांव निवासी भुवन चंद्र, रेवाधर, गोपाल दत्त और चापड़ गांव निवासी नवीन चंद्र,  कुबेर सिंह ने साल भर पहले खेतीबाड़ी छोड़ दी। बंदरों और सूअरों के आतंक के कारण इन काश्तकारों की लगभग ढाई सौ नाली जमीन पिछले एक डेढ़ साल से बंजर पड़ी हुई है। अकेले बेतालघाट ब्लाक में पिछले एक साल में मनरेगा के तहत जाबकार्ड धारकों की संख्या 6956 से बढ़कर इस साल 7136 हो गई है।

बंदरों से न‌िपटने की योजना नहीं
सूअर और अन्य छोटे जानवरों से खेती को बचाने के लिए विभाग सुरक्षा दीवार बनाने की योजना है लेकिन मुख्य कृष‌ि अध‌िकारी धनपत कुमार की मानें तो बंदरों से खेती को बचाने के लिए विभाग के पास अभी कोई कार्ययोजना नहीं है।
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