भविष्य संवारने और पैसे कमाने की प्रतिस्पर्द्धा में युवा आजकल घर और परिवार ही नहीं, देश तक छोड़ देते हैं। लेकिन देहरादून निवासी सुमित ऐसे युवाओं के लिए मिसाल हैं।
लाखों की नौकरी ठुकराकर गरीबों की सेवा के लिए देहरादून में दवा बैंक खोलकर उन्होंने अनूठी पहल शुरू की है। उनके दवा बैंक से सैकड़ों गरीब और मजदूरों को न केवल दवाएं मिलती हैं, बल्कि मुफ्त इलाज भी होता है। सुमित की पहल से प्रभावित एमबीबीएस डॉ.एसके तोमर अपना क्लीनिक छोड़ रोजाना दवा बैंक में डेढ़ घंटे मरीज देखते हैं।
राजधानी के चंद्रबनी-भूतोवाला निवासी 22 वर्षीय सुमित कुमार ने करनाल, हरियाणा से 12वीं के बाद हरियाणा स्थित गुरु ब्रह्मानंद कॉलेज से पॉलीटेक्निक किया है। पॉलीटेक्निक में उन्हें ऑल इंडिया 17वीं रैंकिंग मिली।
गरीबों, असहाय और बेसहारा लोगों की सेवा करने का मन बनाया
sumit
सुमित को फरीदाबाद में जीसीबी कंपनी से 16 लाख रुपये सालाना पैकेज मिला, लेकिन नौकरी ठुकराकर वह जसपुर चले गए और योग एवं नेचुरल थेरेपी की पढ़ाई की। इसमें भी सुमित को गोल्ड मिला। मूल रूप से सहारनपुर के रहने वाले सुमित के पिता बृजपाल सिंह ट्रांसपोर्ट कारोबारी हैं।
एक भाई जापान में हैं और दूसरे की देहरादून में ही कंपनी है। सुमित के अनुसार, करनाल में पढ़ाई के दौरान उनका कुष्ठ रोगियों के आश्रम में अधिकांश वक्त बीतता था। तभी से उन्होंने गरीबों, असहाय और बेसहारा लोगों की सेवा करने का मन बनाया।
दून लौटने पर परिवार वालों ने कारोबार में हाथ बंटाने और नौकरी करने का दबाव बनाया, लेकिन सुमित ने उनकी नहीं सुनी। इसके बाद उन्होंने गरीबों और असहायों की मदद के लिए ‘अमूल्य जीवन विकास चैरिटेबल सोसायटी’ बनाई।
घर ही बन गया मेडिकल स्टोर
medicine
25 जुलाई 2017 को घर पर ही सुमित ने दवा बैंक खोला और लोगों के घरों से बची दवाएं एकत्र करना शुरू किया। धीरे-धीरे दवाओं का ढेर लगने लगा और घर ही मेडिकल स्टोर बन गया। सुमित के इस फितूर को देख परिवार वालों ने घर उन्हें दे दिया और खुद दूसरे घर में शिफ्ट हो गए।
सुमित ने दवाओं को जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए चंद्रबनी में क्लीनिक चलाने वाले एमबीबीएस डॉ.एसके तोमर से संपर्क किया। डॉ.तोमर सुमित की पहल से बेहद प्रभावित हुए और क्लीनिक छोड़कर सुमित के दवा घर में रोजाना दोपहर 12.30 से दो बजे तक बैठना शुरू कर दिया। डॉ.तोमर मरीजों को देखते हैं और उनके मर्ज के हिसाब से दवा बैंक से दवाएं देते हैं।
डॉ.तोमर की मदद से सुमित ने शहर में कई मेडिकल स्टोर, दवा कंपनियों और समाजसेवियों से संपर्क बढ़ाया। कुछ सैंपल की दवाएं देते हैं तो कुछ समाजसेवी दवाएं खरीदकर देते हैं। लोगों के घरों से बची दवाओं को एकत्र करने के लिए 11 लोग सुमित से जुड़े हैं। शहर के मेडिकल स्टोरों और कई दुकानों में डिब्बे रखे हैं, जिनमें लोग दवाएं डाल जाते हैं। सुमित के दवा बैंक से 600 से ज्यादा मरीजों जुड़े हैं। मरीजों के हेल्थ कार्ड भी बने हैं। वहां उनका फ्री इलाज और दवाएं दी जाती हैं। डॉ.तोमर और सुमित बताते हैं कि असहाय लोगों की मदद से उनको खुशी मिलती है।
दिल्ली में ओमकार नाथ भी चलाते हैं दवा बैंक
सुमित की तरह दिल्ली के मोतीबाग कॉलोनी में ओमकार नाथ शर्मा भी वर्षों से गरीबों के लिए दवा बैंक चला रहे हैं। शर्मा चलती फिरती दवा की दुकान हैं। वह लोगों के घर-घर जाकर उनकी बची दवाएं एकत्र करते हैं और जरूरतमंदों को देते हैं। शर्मा का घर भी दवाओं के ढेर से भरा होता है। सुमित ने बताया कि वह शर्मा जी से मिले तो नहीं हैं, लेकिन उनके बारे में सुनकर प्रेरणा ली है।