उत्तराखंड में भगवान शिव का एक ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जहां जिस रूप में भी मनोकामना मांगी जाती थी, वह उस रूप में पूरी हो जाती थी। लेकिन आदि शंकराचार्य ने यहां ऐसा उपाय किया कि अब यहां जनकल्याण और और अच्छी भावना से मांगी गई मनोकामनाएं ही पूरी होती हैं।
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भगवान सदाशिव के 12 रूपों में एक
यह ज्योतिर्लिंग कोई और नहीं जागेश्वर धाम है, भगवान सदाशिव के बारह रूपों में से एक है। योगेश्वर के नाम से विख्यात इस ज्योतर्लिंग के बारे में कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं। इसका तब भारी दुरुपयोग हो रहा था।
आदि शंकराचार्य ने किया यह उपाय
आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजय में स्थापित शिवलिंग को कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। इस उपाय से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनाएं पूरी नहीं होती। केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।
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देश में यहीं है शिव का महामृत्युंजय रूप
ऐसी मान्यता है कि शिव का महामृत्युंजय रूप भारत में केवल जागेश्वर में ही है। जागेश्वर की हरी-भरी घाटी में नन्दनी और सुरभि नाम की दो छोटी-छोटी नदियां हैं। जिसे बाद में जटा गंगा कहते हैं। यहां एक कुण्ड भी है, जिसमें श्रद्धालु स्नान करने के बाद मंदिर में पूजा करने जाते हैं। मंदिर के नीचे शमशान घाट है। यहां शवदाह करना बड़ा पवित्र माना जाता है।