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विश्वयुद्ध से सर्जिकल स्ट्राइक तक कई युद्धों के साक्षी रहे हैं देश सेवा में लगे इस परिवार के सदस्य 

Sun, 09 Dec 2018 11:44 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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अपने पिता के साथ गुरवीर तलवार - फोटो : अमर उजाला
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शौर्य और साहस का दूसरा नाम है पंचकुला का तलवार परिवार। इस परिवार के वीरों ने प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर दो साल पहले सर्जिकल स्ट्राइक तक सभी युद्धों में अपने साहस का लोहा मनवाया।

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आज इस परिवार की पांचवीं पीढ़ी के गुरवीर तलवार ने प्रशिक्षण के दौरान ही अपनी विरासत में मिली इस शौर्य गाथा को साबित किया।

आईएमए में प्रशिक्षण के दौरान बेहतरीन प्रदर्शन के लिए पासिंग आउट परेड में गुरवीर तलवार सिल्वर मेडल से नवाजा गया।

पिता कर्नल केएस तलवार वर्तमान में सेना में सेवारत

गुरवीर सिंह तलवार का परिवार मूल रूप से पंचकुला हरियाणा का रहने वाला है। उनके पिता कर्नल केएस तलवार वर्तमान में सेना में सेवारत हैं।

गुरवीर के दादा के दादा सूबेदार मेजर सरदार बहादुर दीवान सिंह तलवार अंग्रेजी शासनकाल में गठबंधन सेना की ओर से प्रथम युद्ध में भाग ले चुके हैं। वे आनरेरी कैप्टन पद से सेवानिवृत्त हुए।

इसके बाद उनके बेटे यानी गुरवीर के परदादा कर्नल वर्यम सिंह भी परतंत्र भारत में सेना का हिस्सा रहे और गठबंधन सेना की ओर से द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लिया।

सभी युद्धों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेता रहा है तलवार परिवार

भारत आजाद हुआ और पाकिस्तान से छिटपुट युद्ध होते रहे। इन सभी युद्धों में तलवार परिवार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेते रहे।

आजादी के 12 साल बाद चीन से रिश्ते तल्ख हुए और उसने भारतीय सेना से छद्म युद्ध छेड़ दिया। इस युद्ध में भी गुरवीर सिंह की चौथी पीढ़ी के सदस्य यानी उनके दादा मेजर जनरल एचएस तलवार प्रत्यक्ष रूप से भागीदार बने।

वर्तमान में गुरवीर के पिता कर्नल केएस तलवार भारतीय सेना में सेवारत हैं। 
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बचपन से ही सैन्य माहौल में पले बढ़े गुरवीर

गुरवीर सिंह का लालन पोषण तो सैन्य माहौल में हुआ ही, शुरूआत से शिक्षा दीक्षा भी भारतीय राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज में हुई। गुरवीर आठवीं कक्षा में ही आरआईएमसी में आ गए।

इसके बाद एनडीए खड़गवासला और आईएमए में प्रशिक्षण हासिल किया। यहां भी गुरवीर सिंह विरासत में मिले शौर्य को दिखाया और सिल्वर मेडल हासिल किया।

गुरवीर सिंह कहते हैं कि वे बचपन से ही सैन्य माहौल में पले बढ़े इसलिए उन्हें सेना के प्रशिक्षण में ज्यादा परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा। पीछे पिता और दादा परदादाओं की कहानियां थीं तो आईएमए की कठिनतम प्रशिक्षण उन्होंने हंसते खेलते पूरा कर लिया।
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