मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्राथमिकता के बावजूद इस वर्ष भी एंटी ड्रग्स पॉलिसी नहीं बन पाई। यह हाल तब है जब स्पेशल टॉस्क फोर्स कई माह पहले कई राज्यों की पॉलिसी पर मंथन कर कार्ययोजना का प्रस्ताव शासन को भेज चुकी है। प्रस्ताव में पुलिस के अलावा स्वास्थ्य विभाग, समाज कल्याण और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी तय की गई है। इसमें सरकारी नशा मुक्ति केंद्राें के अलावा स्कूल और कॉलेजों की भी जवाबदेही तय की गई है।
परिवहन निगम के बेड़े में शामिल नहीं हो सकीं 300 नई बसें
साल 2019 की शुरुआत में ही सरकार व परिवहन निगम प्रबंधन ने राज्य के लोगों को इस बात का आश्वासन दिया कि परिवहन निगम की बसों में उन्हें बेहतर यात्रा सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।आखिरकार काफी जद्दोजहद के बाद अशोक लेलैंड व टाटा कंपनी से 150-150 बसों की खरीद की सहमति बनी। टाटा कंपनी ने तो 150 बसों की आपूर्ति भी कर दी, लेकिन अशोक लेलैंड कंपनी ने अपने हिस्से की 150 बसों की आपूर्ति नहीं कर पायी है।
आईपीएल में खिलाड़ियों को देखने की ख्वाहिश अधूरी
क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (सीएयू) को बीसीसीआई से मान्यता मिलने और बीसीसीआई में महिम वर्मा को उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिलने से उत्तराखंड क्रिकेट को नई पहचान मिली। इसके बाद क्रिकेट प्रेमियों में आस जगने लगी कि अब उत्तराखंड के खिलाड़ियों को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में खेलने का मौका मिलेगा। वहां से उनकी भारतीय टीम में जगह बनाने की राह खुलेगी। मगर, आईपीएल ऑक्शन में उत्तराखंड के खिलाड़ी फ्रेंचाइजी की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए।
छात्रवृत्ति भुगतान का था लक्ष्य, नहीं हुआ पूरा
वर्ष 2018-19 की छात्रवृत्ति का भुगतान अभी तक नहीं हो सका है। छात्रवृत्ति का भुगतान लंबित होने से अभ्यर्थियों को फीस भुगतान में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें अभी दो माह का समय लगने की उम्मीद है। इसके बाद ही वर्ष 2019-2020 की छात्रवृत्ति का भुगतान शुरू हो सकेगा। विभाग की ओर से इसके पीछे नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल बंद होने का हवाला दिया जाता है तो कभी बजट की कमी का।
न स्मार्ट राशन कार्ड बन पाए न कार्डों का नवीनीकरण हो पाया
दिल्ली, मध्यप्रदेश आदि राज्यों की तर्ज पर उत्तराखंड में स्मार्ट राशन कार्ड की योजना धरातल पर नहीं उतर पाई। लोग सालभर जूझते रहे, लेकिन न उनके कार्डों का नवीनीकरण हो पाया और न स्मार्ट राशन कार्ड बन पाए।