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ईयर एंडर 2019: काश! उत्तराखंड के इन सपनों को भी मिलता आकाश

Tue, 31 Dec 2019 02:14 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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2019 में जहां उत्तराखंडवासियों की कई उम्मीदें पूरी हुईं तो बहुत सी हसरतें ऐसी थीं जो अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सकीं। इन सबके बीच विकास की अधूरी दास्तां बहुत से सवाल पीछे छोड़ गई।

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इन सवालों के जवाब आने वाले समय में मिलते हैं या नहीं, यह तो तब ही पता चलेगा, लेकिन लोगों को इनके मुकम्मल होने का इंतजार रहेगा। आइए! जानते हैं कि कुछ ऐसी उम्मीदों के बारे में जो वास्तविकता के धरातल पर अभी तक नहीं उतर सकीं और लोगों के सपने अधूरे रह गए।

पूरा नहीं हो पाया भू-रिकॉर्ड ऑनलाइन का सपना

देहरादून जिले का भू-रिकॉर्ड इस साल भी ऑनलाइन नहीं हो पाया। जबकि, जुलाई तक इनके पूरे होने की संभावना थी। बताया जा रहा है मुंबई की जिस कंपनी को यह कांट्रेक्ट मिला था उसके साथ भुगतान की दरों को लेकर बात अटकी पड़ी है। अब जनवरी या फरवरी में इस पर दोबारा से काम किया जाएगा।  
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32 नए वार्डों में शुरू होता कूड़ा उठान तो मिलती राहत 

देहरादून नगर निगम में शामिल 32 नए वार्डों में कूड़ा उठान शुरू हो जाता तो लोगों को राहत मिलती। अधिकारियों का कहना है अगले दो-तीन माह के भीतर नए वार्डों से डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन व्यवस्था शुरू हो जाएगी। 

अधूरा रह गया लाइट एंड साउंड शो शुरू करने का सपना 
मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) की ओर से राजपुर स्थित पार्क में बन रहे प्रदेश के पहले लाइट एंड साउंड शो शुरू करने का सपना अधूरा रह गया। इस वर्ष इसका काम पूरा नहीं हो पाया।

मॉडर्न ओटी और डिजिटलाइजेशन का सपना अधूरा
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इस साल मरीजों की सुविधा के लिए कई योजनाओं पर काम हुआ। इन सब के बावजूद मॉडर्न ऑपरेशन थियेटर और डिजिटलाइजेशन करने का सपना अधूरा ही रहा। जिले के सबसे बड़े राज्य सरकार के अस्पताल दून मेडिकल अस्पताल में नई ओपीडी बिल्डिंग का निर्माण तो हुआ, लेकिन अब तक इस बिल्डिंग में सभी विभागों की ओपीडी शुरू नहीं हो पाई। इससे मरीजों को एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
 

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2019 में भी नहीं बन पाई एंटी ड्रग्स पॉलिसी

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्राथमिकता के बावजूद इस वर्ष भी एंटी ड्रग्स पॉलिसी नहीं बन पाई। यह हाल तब है जब स्पेशल टॉस्क फोर्स कई माह पहले कई राज्यों की पॉलिसी पर मंथन कर कार्ययोजना का प्रस्ताव शासन को भेज चुकी है। प्रस्ताव में पुलिस के अलावा स्वास्थ्य विभाग, समाज कल्याण और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी तय की गई है। इसमें सरकारी नशा मुक्ति केंद्राें के अलावा स्कूल और कॉलेजों की भी जवाबदेही तय की गई है। 

परिवहन निगम के बेड़े में शामिल नहीं हो सकीं 300 नई बसें
साल 2019 की शुरुआत में ही सरकार व परिवहन निगम प्रबंधन ने राज्य के लोगों को इस बात का आश्वासन दिया कि परिवहन निगम की बसों में उन्हें बेहतर यात्रा सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।आखिरकार काफी जद्दोजहद के बाद अशोक लेलैंड व टाटा कंपनी से 150-150 बसों की खरीद की सहमति बनी। टाटा कंपनी ने तो 150 बसों की आपूर्ति भी कर दी, लेकिन अशोक लेलैंड कंपनी ने अपने हिस्से की 150 बसों की आपूर्ति नहीं कर पायी है।

आईपीएल में खिलाड़ियों को देखने की ख्वाहिश अधूरी

क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (सीएयू) को बीसीसीआई से मान्यता मिलने और बीसीसीआई में महिम वर्मा को उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिलने से उत्तराखंड क्रिकेट को नई पहचान मिली। इसके बाद क्रिकेट प्रेमियों में आस जगने लगी कि अब उत्तराखंड के खिलाड़ियों को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में खेलने का मौका मिलेगा। वहां से उनकी भारतीय टीम में जगह बनाने की राह खुलेगी। मगर, आईपीएल ऑक्शन में उत्तराखंड के खिलाड़ी फ्रेंचाइजी की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए।

छात्रवृत्ति भुगतान का था लक्ष्य, नहीं हुआ पूरा 

वर्ष 2018-19 की छात्रवृत्ति का भुगतान अभी तक नहीं हो सका है। छात्रवृत्ति का भुगतान लंबित होने से अभ्यर्थियों को फीस भुगतान में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।  इसमें अभी दो माह का समय लगने की उम्मीद है। इसके बाद ही वर्ष 2019-2020 की छात्रवृत्ति का भुगतान शुरू हो सकेगा। विभाग की ओर से इसके पीछे नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल बंद होने का हवाला दिया जाता है तो कभी बजट की कमी का।

न स्मार्ट राशन कार्ड बन पाए न कार्डों का नवीनीकरण हो पाया

दिल्ली, मध्यप्रदेश आदि राज्यों की तर्ज पर उत्तराखंड में स्मार्ट राशन कार्ड की योजना धरातल पर नहीं उतर पाई। लोग सालभर जूझते रहे, लेकिन न उनके कार्डों का नवीनीकरण हो पाया और न स्मार्ट राशन कार्ड बन पाए।
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