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ये बेटियां बदलेंगी समाज की रुढ़िवादी सोच

Mon, 07 Oct 2013 12:10 PM IST
नलिनी गुसाईं/अमर उजाला, देहरादून
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दिवंगत कांग्रेसी नेता देवेंद्र सेठी की तरह देहरादून में कई और ऐसे लोग हैं, जिनके आंगन में बेटे नहीं, बेटियां खिलखिलाती हैं।
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रूढ़िवादी भले वंश और रस्मों के निर्वाह में बेटे की जरूरत जताते हों, लेकिन इन पिताओं को बेटे न होने का कोई गम नहीं। वे साफ कहते हैं कि उन्हें बेटियों का पिता होने पर फख्र है और वे भी सेठी की तरह यही चाहते हैं कि उनका अंतिम संस्कार उनकी बेटियां ही करें।

अन्य लोगों को भी सीख लेनी चाहिए
सेठी की अंतिम यात्रा में पहुंचे पंजाबी संगठन के महानगर अध्यक्ष विजय बग्गा ने बताया कि उनकी भी दो बेटियां हैं। कहा कि सेठी और उनकी बेटियों ने जो पहल की है, उससे अन्य लोगों को भी सीख लेनी चाहिए।
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पढ़ें, अंतिम इच्छाः बेटियों ने पिता को दी मुखाग्नि

बग्गा ने कहा कि बेटा न होना मोहताजी की बात नहीं है। बेटियां, बेटों से किसी मायने में कम नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा भी यही है कि उनकी बेटियां उन्हें मुखाग्नि दें।

कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के जनसंपर्क अधिकारी विजय चौहान भी दो बेटियों के पिता हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग दकियानूसी सोच रखते हैं, लेकिन इससे उन्हें कोई इत्तिफाक नहीं है। चौहान ने कहा कि उनकी बेटियां ही उनके बेटे हैं। कहा कि वह भी चाहते हैं कि उनकी दोनों बेटियां ही उन्हें मुखाग्नि दें।
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‘कन्या पिंडदा धन हारिणी च’
धर्म सिंधु और वायु पुराण के अनुसार कन्या पिता का पिंडदान आदि क्रियाएं करने की अधिकारी है। यदि कन्या का भाई है, लेकिन पिता से उसका मतभेद है या किसी अन्य वजह से वह पिता का अंतिम संस्कार नहीं कर सकता या नहीं करना चाहता तो बेटी उसकी जगह ले सकती है।

शास्त्रों में लिखा है ‘कन्या पिंडदा धन हारिणी च’ यानी धन ग्रहण करने वाली कन्या पिता का अंतिम संस्कार कर सकती है।
-आचार्य भरत राम तिवारी, उपाध्यक्ष, उत्तराखंड विद्वत सभा

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