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उद्पाल्टा और कुरोली गांव के बीच होगा गागली युद्ध

सार

वहीं दुर्गा अष्टमी के दिन रानी मुन्नी की प्रतिमाओं को बनाकर घरों में उन्हें पूजा गया। इससे आहत होकर मुन्नी भी कुएं में अपनी जान दे देती है, जिससे राज्यवासियों को श्राप लगता है। इसी श्राप से मुक्ति के लिए सदियों से दोनों गांवों के बीच गागली युद्ध की परंपरा निभाई जाती है।
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विस्तार
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पूरे देश में जहां दशहरे के दिन रावण, मेघनाद व कुंभकरण के पुतले दहन किए जाएंगे, वहीं श्राप मुक्ति के लिए जौनसार के उद्पाल्टा व कुरोली गांव के लोग गागली युद्ध के साथ ही रानी मुन्नी की प्रतीकात्मक प्रतिमाओं को कुएं में विसर्जित करेंगे। श्राप मुक्ति के लिए होने वाले दो गांवों के बीच गागली युद्ध की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। वहीं दुर्गा अष्टमी के दिन रानी मुन्नी की प्रतिमाओं को बनाकर घरों में उन्हें पूजा गया।
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जौनसार बाबर जनजातीय क्षेत्र में पांईता पर्व की अपनी अलग ही पहचान है। पर्व के अंतिम दिन दशहरे के अवसर पर उद्पाल्टा व कुरोली गांव के लोग अपनी सदियों पुरानी श्राप मुक्ति की परंपराओं को निभाते हैं। रानी मुन्नी की प्रतिमाओं को क्याणी जंगल में स्थित एक कुएं में विसर्जित किया जाता है। इस युद्ध को देखने स्थानीय के साथ ही पड़ोसी राज्य हिमाचल और अन्य जगहों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
75 वर्षीय खत स्याणा राजेंद्र सिंह राय, गंगा सिंह राय आदि लोगों का कहना है कि एक कथा के अनुसार एक राजा के राज्य में रानी व मुन्नी नाम की दो बहने हुआ करती थीं। एक दिन दोनों कुएं में पानी भरने गईं। इस दौरान रानी कुएं में डूब जाती है, जिसके लिए मुन्नी को जिम्मेदार ठहराया जाता है। इससे आहत होकर मुन्नी भी कुएं में अपनी जान दे देती है, जिससे राज्यवासियों को श्राप लगता है। राजा का राज्य तहस-नहस हो जाता है। इसी श्राप से मुक्ति के लिए सदियों से दोनों गांवों के बीच गागली युद्ध की परंपरा निभाई जाती है।
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