विकासखंड के बोंदूर खत अंतर्गत मानथात में बृहस्पतिवार को पौराणिक नुणाई मेला आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। हालांकि, रुक-रुककर हुई बारिश के कारण इस बार मेले की रौनक थोड़ी फीकी रही और आसपास के गांवों से ग्रामीणों की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन परंपरा के निर्वहन में कोई कमी नहीं आई। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे लोगों ने ढोल-दमाऊं और अन्य वाद्य यंत्रों की थाप पर हारुल, जैंता, रासो व तांदी जैसे लोकनृत्यों के जरिए जौनसार-बावर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया। बोंदूर खत के सदर स्याणा रजनीश पंवार, चंडी प्रसाद नौटियाल, सुनील नौटियाल, राजेंद्र प्रसाद नौटियाल और प्रताप उनियाल ने बताया कि नुणाई पर्व का सीधा संबंध भेड़ पालकों की सकुशल घर वापसी से है। पूर्व में क्षेत्र के भेड़ पालक करीब छह माह तक ऊंचाई वाले बुग्यालों और जंगलों में भेड़ों को चराने के बाद इसी समय गांव लौटते थे। उनकी सुरक्षित वापसी की खुशी में ग्रामीण मानथात में एकत्र होकर स्वागत करते थे और भेड़ों को नमक खिलाया जाता था। इसी परंपरा के कारण पर्व का नाम नुणाई पड़ा। वर्तमान में भेड़ पालन का चलन कम होने के बावजूद स्थानीय लोग इस सांस्कृतिक विरासत को पूरी आस्था के साथ जीवित रखे हुए हैं।वनदेवियों को अर्पित किया जाता है मीठा सेरुवा : नुणाई पर्व पर प्रत्येक घर में पारंपरिक व्यंजन मीठा सेरुवा तैयार किया जाता है। इसका एक भाग मानथात स्थित नुणाई थात में वनदेवियों और वन अप्सराओं को अर्पित किया जाता है, जबकि दूसरा भाग भेड़ चराहों को प्रसाद स्वरूप दिया जाता है। इसके अलावा सोने-चांदी के टीके, बिंदी, चूड़ी सहित श्रृंगार सामग्री, हल्दी, आटा और चावल भी वनदेवियों को समर्पित किए जाते हैं।