केदारघाटी से लापता होने वालों में दून के एक 65 साल के बुजुर्ग दंपति मदन और किरन का सहारा भी था। आशीर्वाद इन्क्लेव के एक छोटे से आउट हाउस में किराए पर रहने वाले इस दंपति की आंखें बेटे के नाम से भर आती है।
उसके न लौटने की बात करते-करते गला रूंध जाता है, लेकिन उम्मीद की बात पर आंखें झिलमिलातीं नजर आती है। इन्हें उम्मीद है, एक दिन इनके दिल का टुकड़ा जरूर लौटेगा।
मदन बताते हैं कि उनका 26 वर्षीय बेटा महेश हर साल की इस बार भी केदारनाथ गया था। वही सहारा था। वह पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन मेहनत-मजदूरी करके काम चलाता था। आज वह आंखों के आगे नहीं तो दोनों उसे याद कर-करके हर वक्त आंसू बहाते हैं।
मदन कपड़ों पर इस्तरी कर पैसे जोड़ता है तो वहीं किरन झाड़ू, पोंछे, बर्तन का काम कर गृहस्थी चलाने में मदद करती है। किरन रूंधे गले से कहती है-दोनों बड़े बेटे दिल्ली रहते हैं, अपने परिवारों के साथ।
एक महेश ही था, जो सहारा था। अब बुढ़ापे का यह बोझ लेकर कहां जाएं। हरिद्वार से लेकर यहां कलक्टरी, तहसील सब जगह चक्कर काट लिए, कोई नहीं बताता कि महेश कहां है। अगर जिंदा है तो किस हाल में है, कहां है, यह चिंता खाए जाती है। काश कि वह लौट आए तो चैन से आंखें बंद हों।