फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

वनाश्रितों ने किया सचिवालय कूच, पुलिस ने कनक चौक पर रोका- फोटो खबर

विज्ञापन
अपनी मांगों के लिए सचिवालय कूच के बाद कनक चौक बेरिके‌डिंग के सामने प्रदर्शन करते अखिल भारतीय वन-ज
विज्ञापन
वनाधिकारों की मांगों को लेकर अखिल भारतीय वन जन श्रमजीवी यूनियन की अगुवाई में कई संगठनों ने सोमवार को सचिवालय कूच किया। इससे पहले यह लोग सचिवालय पहुंचते पुलिसकर्मियों ने उन्हें कनक चौक पर रोक लिया। इस पर दोनों पक्षों में जमकर नोकझोंक हुई। सचिवालय कूच कर रहे लोग इस बात पर अड़ गए कि वे प्रमुख सचिव वन को ज्ञापन सौंपेंगे। लेकिन पुलिस के सभी को यह कहकर शांत किया कि वह किसी बैठक में व्यस्त हैं। उसके बाद ज्ञापन अपर जिलाधिकारी को सौंपा गया।
विज्ञापन

इससे पूर्व सचिवालय कूच कर रहे वनाश्रितों ने परेड मैदान में एक सभा की। इसमें वक्ताओं ने कहा कि सरकार वनाश्रितों को उनका अधिकार देने में आनाकानी कर रही है। वन क्षेत्रों से बेदखल किए जाने के नाम पर इनका शोषण किया जा रहा है। ऐसे में वनाधिकार कानून-2006 में उल्लेखित प्रावधानों का लागू कराने में राज्य सरकार प्रभावी कदम उठाए। सचिवालय कूच करने वालों में नूर मोहम्मद गुर्जर, वजीर चोपड़ा, सुरेश सिंह सजवाण, गुलाम मुस्तफा, इंदु नौढियाल, अर्जुन रावत, पार्वती, हैमजा, वजीर अहमद, जयकृष्ण कंडवाल, डॉ. जितेेंद्र भारती, बच्चीराम कौंसवाल, एसएस नेगी, राजेंद्र पुरोहित के अलावा अखिल भारतीय वन जन श्रमजीवी यूनियन, अखिल भारतीय किसान सभा, उत्तराखंड वन पंचायत संघर्ष मोर्चा, उत्तराखंड वन गुर्जर यूनियन, उत्तराखंड वन आश्रित एवं टोंगिया, गोट, खत्ते समुदाय व उत्तराखंड प्रजाहितकारिणी समिति के सदस्य उपस्थित रहे।
विज्ञापन

मांगें
1- वनाधिकार कानून- 2006 में उल्लेखित वनाधिकारोें को लागू कराया जाए।
2- केेंद्र व राज्य सरकार वनाधिकार कानूनों को लेकर अदालतों में ठोस पैरवी करें।
3- वनाश्रितों को वन क्षेत्रों से जबरन बेदखल न किया जाए।
4- वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार सभी जिलों में वर्ष 2009 के बाद लंबित प्रकरणों का निस्तारण करें।
5- टोंगिया, गोठ व खत्तों समेत सभी वन ग्रामोें को राजस्व गांव में बदलने की प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाए।
6- वनाधिकार लागू कराने में अनुसूचित जनजाति निदेशालय अपनी अहम भूमिका निभाए।
7- राज्य सरकार द्वारा साल 2001 में वन अधिनियम संशोधन को तत्काल निरस्त करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें