दून को खुले में शौच मुक्त शहर बनाने में निगम को अभी कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। पिछले स्वच्छता सर्वेक्षण में दून को ओडीएस में एक हजार में से छह सौ नंबर मिले थे। ऐसे में दून को खुले में शौच मुक्त करने के लिए नगर निगम को आधा रास्ता और तय करना पड़ेगा, लेकिन इस दिशा में फिलहाल नगर निगम खास मशक्कत नहीं करता दिखाई देता।
नगर निगम बेशख नगर क्षेत्र को ओडीएफ घोषित करता हो, लेकिन सर्वेक्षण की रिपोर्ट इससे इत्तेफाक नहीं रखती। दरअसल, स्वच्छता सर्वेक्षण में शहर को अलग-अलग मानकों पर मापा जाता है। इसके हिसाब से रैंकिंग तय की जाती है। शहर को खुले में शौच मुक्त करने के लिए पिछली बार एक हजार प्वाइंट तय गए किए थे। बात करें देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर की तो इंदौर को ओडीएफ में एक हजार नंबर मिले थे। जबकि दून को मात्र 600 नंबर से संतुष्ट होना पड़ा। दरसअल, जब स्वच्छता सर्वेक्षण की शुरुआत हुई थी तो इंदौर का हाल भी दून जैसा ही था, लेकिन इसके बाद उन्होंने दो साल के शहर को खुले में शौच मुक्त करने के लिए एक मुहिम चलाई।
जगह-जगह सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया। बताया जा रहा है कि इंदौर ने हर दो सौ मीटर की दूरी पर शौचालय का निर्माण कराया। इससे इंदौर को एक साल के अंदर ही ओडीएफ प्लस का खिताब मिला। वहीं, देहरादून की बात करें तो इस मामले में दून अभी काफी पीछे हैं। शहर में मात्र 41 शौचालय हैं। इनकी हालत भी खस्ताहाल बनी हुई है। कहीं पानी नहीं है तो कहीं सफाई। अधिकतर बाजारों में शौचालय हैं ही नहीं। इससे व्यापारी और आमलोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं।
इंदौर की तरह अगर दून को भी खुले में शौच से मुक्त करना है तो इसके लिए नगर निगम को सार्वजनिक शौचालयों की संख्या बढ़ाने पर जोर देना होगा। साथ ही वर्तमान में जो सार्वजनिक शौचालय हैं, उनकी हालत में भी सुधार करना होगा। इनकी साफ-सफाई से लेकर इनमें पानी आदि की व्यवस्था करनी होगी। तभी दून को खुले में शौच मुक्त किया जा सकता है।
Iदून में सार्वजनिक शौचालयों की संख्या में बढ़ाई जा रही है। नगर निगम की ओर से दस नए पिंक शौचालय बनाए जा रहे हैं। साथ ही स्मार्ट सिटी और एमडीडीए की ओर से भी पिंक शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है। शहर में बदहाल शौचालयों की दशा सुधारी जा रही है। उम्मीद है कि इस बार दून अपनी रैकिंग में अपेक्षित सुधार करेगा। - सुनील उनियाल गामा, मेयर, नगर निगमI
I13 साल में नहीं मिल सकी सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्तिI
स्वच्छता सर्वेक्षण में पिछड़ने की बड़ी वजह सिंगल यूज प्लास्टिक का प्रयोग भी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला प्रशासन और नगर निगम की पाबंदियों के बाद भी अब तक पाॅलिथीन पर रोक नहीं लग पा रही है। वर्ष 2010 में सबसे पहले पाॅलिथीन पर रोक लगाई गई थी। अब तक इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया जा सका है। हर रोज टनों पाॅलिथीन दून के कचरे से निकलती है, जिसे निस्तारित नहीं किया जा सकता। यह दून नगर निगम के लिए चुनौती बना हुआ है। पाॅलिथीन और सिंगल यूज प्लास्टिक को प्रतिबंधित कागजों में चल रहा है। शहर में पाॅलिथीन का कचरा भरा पड़ा है। शहर में दुकानों व ठेली पर खुलेआम प्रतिबंधित पाॅलिथीन में सामान दिया जा रहा है। यह सेहत के साथ ही पर्यावरण के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है।