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स्वच्छता सर्वेक्षण में धरातल पर सफाई में पिछड़ने की सबसे बड़ी वजह देहरादून के गली-मोहल्लों में रोज सफाई नहीं होना है। गलियों की सफाई के लिए बनाई गई मोहल्ला स्वच्छता समिति कागजों में ही वार्ड चमका रही हैं।
समाजसेवी विनोद जोशी बताते हैं, हकीकत में यह समितियां अस्तित्व में ही नहीं हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम से मिली जानकारी का हवाला देते हुए बताते हैं, कौलागढ़ में मोहल्ला स्वच्छता समिति में दर्शाए सफाई कर्मचारी बाबूलाल, राजेंद्र दोनों ही फर्जी हैं। मोहल्ला समिति में कई अन्य फर्जीवाड़ों का उन्होंने खुलासा कर शहरी विकास मंत्री से प्रकरण की शिकायत की है।
नगर निगम की ओर से सभी 100 वार्ड में मोहल्लों और गलियों की सफाई के लिए मोहल्ला स्वच्छता समिति का गठन किया है। पार्षदों को मोहल्ला स्वच्छता समिति में सफाई कर्मचारी रखकर उनसे सफाई का कार्य करवाने और उन्हें हटाने का अधिकार दिया गया है। समितियां बनते ही वार्डों में गठित मोहल्ला स्वच्छता समिति को लेकर गड़बड़ी की शिकायतें आने लगी थीं। अब तक यही हाल है। सभी वार्ड में समितियां तो गठित हैं, लेकिन यह धरातल पर सफाई करती नजर नहीं आतीं है।
Iसमिति कर्मियों के वेतन पर हर माह 50 लाख रुपये खर्चI
नगर निगम हर माह करीब 50 लाख रुपये स्वच्छता समितियों के जरिए वेतन पर खर्च कर रहा है। इसके बाद भी सफाई नहीं हो रही है। पूर्व में तत्कालीन नगर आयुक्त विनय शंकर पांडेय ने सभी 100 वार्ड की मोहल्ला स्वच्छता समिति की जांच करने के आदेश दिए थे। तब आधे से ज्यादा पार्षदों ने रिकार्ड देने से मना कर दिया था। इसके बाद से वेतन पार्षद को देने के बजाए सीधे कर्मचारी के बैंक खाते में भेजा जाता है।
सभी पार्षदों से स्वच्छता समितियों का संचालन पारदर्शिता के साथ करने के लिए कहा गया है। लगातार निरीक्षण कर सत्यापन भी किया जाता है। इस व्यवस्था को और भी दुरुस्त किया जाएगा। - सुनील उनियाल गामा, मेयर