अनुवांशिक आधार पर कद फिर भी सरकार को कद्र नहीं
गांव के विस्थापित परिवारों ने बताया कि टिहरी में उन्हें पहाड़ मूल का निवास प्रमाण पत्र मिलता था। विस्थापन के बाद वह प्लेन में बसाए गए। यहां पहले तो मूल निवास प्रमाण पत्र के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। वहीं जो स्थायी निवासी प्रमाण पत्र उन्हें मिल रहा है वह हरिद्वार जिले का है। ऐसे में कद काठी रंग और रूप यह कोई मायने नहीं रखता है। प्रमाण पत्र के आधार पर उन्हें मैदानी मानकर सैन्य भर्तियों में कोई छूट नहीं मिलती है। वर्तमान में हालत यह है कि कई युवा जिन्हाेंने सेना में वर्दी पहनने का सपना देखा वह आज होटल मैनेजमेंट से देश के अन्य राज्यों या विदेश में नौकरी करने को मजबूर हैं। अकेले हरिद्वार जिले में विस्थापित हजारों परिवारों के युवा मजबूरन सेना और सुरक्षा के जज्बे को शांत कर दूसरे व्यवसाय में जाने लगे हैं।
बोले भर्ती से वंचित विस्थापित परिवारों के युवा
भर्ती की तैयारी करने में करीब तीन साल गुजारे। जब पहली सेना भर्ती में गया तो माता पिता के अनुसार हमें आरक्षण मिलना था। प्रक्रिया के दौरान सेना के अधिकारियों ने हरिद्वार जिले से पहचान देखी तो उन्होंने मैदान का मानकर सुविधा देने से मना कर दिया। अब बीबीए में दाखिला लेकर पढ़ाई कर रहा हूं। -अमन सिंह रावत
कई बार सेना, पुलिस, आईटीबीपी और बीएसएफ की भर्ती में शामिल हुआ। लंबाई कम होने के कारण और मैदान का निवास प्रमाणपत्र देखकर जो हमारे परिवार में सुविधा मिलती रही वह नहीं मिली। सेना में जाने का सपना तो पूरा नहीं हुआ हालत यह है कि दूसरी नौकरी की तलाश में हूं। -राहुल रावत
माता पिता और परिवार के लगभग सभी लोगों की लंबाई समान है। ऐसे में मैदानी क्षेत्र के समान यह अपेक्षा रखना काफी गलत है कि उनके अनुरूप मानक पर हम पर्वतीय समाज के लोग भी खरे उतरेंगे। विस्थापन के बाद से ही केवल व्यवस्था की अनदेखी का शिकार होना पड़ा यह पूरी तरह गलत हो रहा है। -संजय
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जब यह स्पष्ट हो गया कि सेना में नौकरी मैदान क्षेत्र में निवास करने के चलते नहीं मिल सकती है तो अब अपना काम धंधा शुरू कर दिया हूं। हालत यह है कि परिवार के कई लोग सेना में भर्ती हुए और उन्होंने निष्ठा से देश की सेवा की। जब सेना में जाने का मौका नहीं मिला तो अब आईटीआई कर रहा हूं। -गौरी खरौला