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Haridwar: पहाड़ पर थे योद्धा, मैदान में बसे तो व्यवस्था ने बता दिया नकारा...टिहरी विस्थापितों का छलका दर्द

Mon, 09 Dec 2024 04:43 PM IST
रेनू सकलानी कृष्णकांत मणि त्रिपाठी, माई सिटी रिपोर्टर, हरिद्वार

सार

एक तरफ जहां टिहरी बांध के चलते विस्थापित परिवार अपनी जमीनें और पैतृक संपत्ति सरकार के नाम कर आए। वहीं सरकार ने उन्हें बसाने के लिए बदले में जो जमीनें दीं उसका मालिकाना हक तक नहीं दिया।
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टिहरी गढ़वाल - फोटो : Instagram
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विस्तार
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टिहरी विस्थापितों को तमाम दुश्वारियों का सामना चार दशक बीत जाने के बाद भी करना पड़ रहा है। हरिद्वार जिले के लक्सर रोड किनारे जंगल काटकर बसाए गए परिवारों को जहां भूमिधरी के अधिकार का इंतजार है। वहीं इन परिवारों के युवा अपने पूर्वजों के पलायन के बाद मिलने वाले आरक्षण के लिए लड़ रहे हैं।

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हालत यह है कि पहाड़ के मूल वाशिंदों को सैन्य बलों में भर्ती प्रक्रिया के दौरान मिलने वाला आरक्षण भी समाप्त कर दिया गया। बता दें कि एक तरफ जहां टिहरी बांध के चलते विस्थापित परिवार अपनी जमीनें और पैतृक संपत्ति सरकार के नाम कर आए। वहीं सरकार ने उन्हें बसाने के लिए बदले में जो जमीनें दीं उसका मालिकाना हक तक नहीं दिया। टिहरी विस्थापित कॉलोनी आदर्श टिहरी नगर बसाई गई इसमें विस्थापित होकर कुल 440 परिवार 80 के दशक में आए।

विस्थापितों की मूल समस्याओं का समाधान नहीं हो सका। वर्तमान में करीब सात हजार से अधिक की आबादी वाले मूल पहाड़ी परिवारों के युवा भर्ती में छूट न मिलने के कारण अन्य व्यवसाय में भाग रहे हैं। जिन परिवारों में कभी तीन से चार वर्दीधारी हुआ करते थे उनके युवा लंबाई में छूट नहीं मिलने के कारण आज पीआरडी या होमगार्ड तक की नौकरी के लिए तरस रहे हैं।

अनुवांशिक आधार पर कद फिर भी सरकार को कद्र नहीं

गांव के विस्थापित परिवारों ने बताया कि टिहरी में उन्हें पहाड़ मूल का निवास प्रमाण पत्र मिलता था। विस्थापन के बाद वह प्लेन में बसाए गए। यहां पहले तो मूल निवास प्रमाण पत्र के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। वहीं जो स्थायी निवासी प्रमाण पत्र उन्हें मिल रहा है वह हरिद्वार जिले का है। ऐसे में कद काठी रंग और रूप यह कोई मायने नहीं रखता है। प्रमाण पत्र के आधार पर उन्हें मैदानी मानकर सैन्य भर्तियों में कोई छूट नहीं मिलती है। वर्तमान में हालत यह है कि कई युवा जिन्हाेंने सेना में वर्दी पहनने का सपना देखा वह आज होटल मैनेजमेंट से देश के अन्य राज्यों या विदेश में नौकरी करने को मजबूर हैं। अकेले हरिद्वार जिले में विस्थापित हजारों परिवारों के युवा मजबूरन सेना और सुरक्षा के जज्बे को शांत कर दूसरे व्यवसाय में जाने लगे हैं।

 

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बोले भर्ती से वंचित विस्थापित परिवारों के युवा

भर्ती की तैयारी करने में करीब तीन साल गुजारे। जब पहली सेना भर्ती में गया तो माता पिता के अनुसार हमें आरक्षण मिलना था। प्रक्रिया के दौरान सेना के अधिकारियों ने हरिद्वार जिले से पहचान देखी तो उन्होंने मैदान का मानकर सुविधा देने से मना कर दिया। अब बीबीए में दाखिला लेकर पढ़ाई कर रहा हूं। -अमन सिंह रावत

कई बार सेना, पुलिस, आईटीबीपी और बीएसएफ की भर्ती में शामिल हुआ। लंबाई कम होने के कारण और मैदान का निवास प्रमाणपत्र देखकर जो हमारे परिवार में सुविधा मिलती रही वह नहीं मिली। सेना में जाने का सपना तो पूरा नहीं हुआ हालत यह है कि दूसरी नौकरी की तलाश में हूं। -राहुल रावत

माता पिता और परिवार के लगभग सभी लोगों की लंबाई समान है। ऐसे में मैदानी क्षेत्र के समान यह अपेक्षा रखना काफी गलत है कि उनके अनुरूप मानक पर हम पर्वतीय समाज के लोग भी खरे उतरेंगे। विस्थापन के बाद से ही केवल व्यवस्था की अनदेखी का शिकार होना पड़ा यह पूरी तरह गलत हो रहा है। -संजय

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जब यह स्पष्ट हो गया कि सेना में नौकरी मैदान क्षेत्र में निवास करने के चलते नहीं मिल सकती है तो अब अपना काम धंधा शुरू कर दिया हूं। हालत यह है कि परिवार के कई लोग सेना में भर्ती हुए और उन्होंने निष्ठा से देश की सेवा की। जब सेना में जाने का मौका नहीं मिला तो अब आईटीआई कर रहा हूं। -गौरी खरौला

 

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