गुरु का स्थान माता-पिता से भी ऊपर बताया जाता है। इसे हम जीवन के हर मोड़ पर महसूस करते हैं। माता-पिता के अलावा गुरु ही हमें सही और गलत का अहसास कराता है। जिससे हम आगे बढ़ पाते हैं। सिर्फ पढ़ाई के दौरान ही नहीं बल्कि करियर में भी हमारे कई गुरु होते हैं। मगर इनमें किसी एक का स्थान सर्वोपरि होता है। ऐसे ही राजस्थान में शुरुआती पढ़ाई के दौरान हमारे गुरु रहे हैं हरदयाल सिंह यादव। मैं बहुत छोटे क्षेत्र से ताल्लुक रखता हूं, वहीं पर हरदयाल गुरुजी हमें पढ़ाते थे। उसी दौरान उन्होंने कहा था कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में बड़ा बनने का प्रयास करना चाहिए। उनकी बातें ऐसी थीं कि उनके बारे में हम रात-दिन सोचते थे। उन्हीं की प्रेरणा से आज मैं इस जगह पर हूं। गुरु की महत्ता को मैने खुद भी गुरु रहते समझा है। एमएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने अपने करियर की शुरुआत भी गुरु के रूप में ही की थी। मैने भी एक डिग्री कॉलेज में बतौर शिक्षक काम किया है।
- रामसिंह मीणा, एडीजी कार्मिक, उत्तराखंड पुलिस
गुरुजनों की प्रेरणा से पाया ऊंचा मुकाम
वैसे तो मेरी जिंदगी को संवारने और तस्वीर बदलने में माता-पिता के साथ परिवार के सभी सदस्यों का अहम योगदान रहा, लेकिन जिंदगी में आगे बढ़ने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दो गुरुओं ने दी। जब मैं सहरसा के गवर्नमेंट हाईस्कूल में था तो प्रधानाचार्य व मेरे आदर्श गुरु गंगा सिंह ने मुझे पढ़ाई के प्रति प्रेरित किया। उन्होंने कहा था कि तुम प्रतिभाशाली हो और प्रतिभा का अधिकतम इस्तेमाल कर जिंदगी में ऊंचाइयां हासिल कर नई मिसाल कायम करो। मेरी जिंदगी संवारने में मेरे कालेज के गुरु प्रो. सी भक्तो ने भी अहम भूमिका निभायी। प्रो. सी भक्तो ने इंटर व बीएससी के दौरान पढ़ाने के साथ ही भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी बनने के लिए प्रेरित किया। इन दोनों गुरुआें ने प्रेरित किया कि मै भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी करूं। दोनों गुरुओं की प्रेरणाओं में मुझे आगे बढ़ने का हौसला दिया। आज जिंदगी में जो कुछ भी हूं, उसमें मेरे इन गुरुओं का योगदान सबसे अधिक है। यह ऋण जीवनपर्यंत नहीं चुकाया जा सकता है।
- नितेश झा, सचिव चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण
युवा क्रिकेटरों की पौध तैयार कर रहे मनोज
उत्तराखंड ही नहीं देश के कई राज्यों की टीम में खेल रहे क्रिकेटरों के लिए मनोज रावत किसी द्रोणाचार्य से कम नहीं है। बीसीसीआई लेवल-टू कोच मनोज से क्रिकेट का ककहरा सीखकर अब तक पांच दर्जन से ज्यादा क्रिकेटर अलग-अलग राज्यों की टीम में जगह बना चुके हैं। कभी मनोज के शार्गिद रहे रवि नेगी भी उनके नक्शे कदम पर चलते हुए युवा क्रिकेटरों की पौध तैयार कर रहे हैं। मूलत: अल्मोड़ा निवासी मनोज रावत का जन्म देहरादून में ही हुआ। यहीं पढ़ाई करने के बाद उन्होंने क्रिकेट सीखना शुरू किया। पिता स्व. बीएस रावत खुद भी क्रिकेट के शौकीन थे। उन्होंने मनोज को खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। कॉलेज स्तर पर खेलने के दौरान ही उन्होंने गुजरात में एनआईएस क्रिकेट के लिए फॉर्म भरा, जिसमें उनका चयन हो गया। इसके बाद उन्होंने विधिवत रूप से कोचिंग की शुरूआत की। उनकी कोचिंग में कई खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया, जिससे उन्हें हौसला मिला। 2009 में उन्होंने बीसीसीआई लेवल-वन कोचिंग उत्तीर्ण किया। छत्तीसगढ़ से लेवल-टू कोर्स करने के बाद उन्हें विज्जी ट्रॉफी के लिए नॉर्थ जोन का कोच नियुक्त किया गया। इसके बाद उन्हें कई अन्य स्तरों पर कोचिंग की जिम्मेदारी सौंपी गई। मनोज रावत की कोचिंग में अब तक 60 से अधिक खिलाड़ी रणजी ट्रॉफी और अन्य स्तरों की क्रिकेट टीमों में जगह बना चुके हैं।