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राजभवन के पत्रों में उलझी आयुर्वेद विवि की नियुक्तियां

Thu, 16 Jul 2015 01:12 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों की भर्ती के लिए होने वाली लिखित परीक्षा पर रोक के बाद अब राजभवन से आने वाले पत्रों में पूरी प्रक्रिया उलझकर रह गई है।
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एक ओर राजभवन ने सात जुलाई को उत्तराखंड आयुर्वेद विवि को सवालों के जवाब न देने तक परीक्षा न कराने का पत्र भेजा है तो दूसरी ओर ताजा पत्र में राजभवन के विशेष कार्याधिकारी अरुण ढौंडियाल ने कहा है कि राजभवन ने परीक्षा स्थगित नहीं की है, यह फैसला आयुर्वेद विवि का था।

पत्रों के इस जाल में विवि की यह नियुक्ति प्रक्रिया और बीएएमएस की सरकारी सीटों की मान्यता दोनों लटकती नजर आ रही हैं।

पत्रों का यह कैसा खेल
22 दिसंबर, 2014 को तत्कालीन राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी की प्रभारी सचिव डॉ. निधि पांडेय की ओर से एक पत्र प्रमुख सचिव को भेजा गया है।

इसमें साफ किया गया है कि विवि के परिसर ऋषिकुल और गुरुकुल परिसर में शिक्षकों की नियुक्ति/ पदोन्नति के लिए चयन समिति में पूर्व आईपीएस डीके भट्ट को सदस्य नामित किया जाता है। हालांकि कहा गया कि इसे नजीर न माना जाए। यानी राजभवन ने चयन के लिए सदस्य नामित किया।
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30 जून, 2015 को आयुर्वेद विवि के कुलसचिव मृत्युंजय कुमार मिश्रा की ओर से प्रमुख सचिव, आयुष एवं आयुष शिक्षा परिषद को पत्र भेजा गया। इसमें बताया गया कि 22 दिसंबर 2014 और 30 मई को विज्ञप्ति जारी की गई थी। उन्होंने बताया था कि चयन में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए विवि ने रिक्त पदों पर स्क्रीनिंग टेस्ट कराने का निर्णय लिया है।

इसके तहत विवि की ओर से परीक्षा केंद्र पर सीसीटीवी कैमरे, वीडियोग्राफी, बायोमीट्रिक कार्ड मशीन और मोबाइल जैमर की व्यवस्था की जाएगी। परीक्षा के सफल संचालन के लिए शासन स्तर से जिलाधिकारी से सेक्टर मजिस्ट्रेट तैनात कराने और एसएसपी से पुलिस बल उपलब्ध कराने की मांग की गई।

4 जुलाई, 2015 को प्रमुख सचिव ओमप्रकाश की ओर से जिलाधिकारी देहरादून के नाम एक पत्र भेजा गया है, जिसमें कहा गया है कि आयुर्वेद विवि की ओर से 19 जुलाई को सुबह 10 से 11:30 बजे होने वाली स्क्रीनिंग परीक्षा में योग्य अधिकारी को सेक्टर मजिस्ट्रेट नामित करने के साथ ही पुलिस बल की व्यवस्था सुनिश्चित करें।

7 जुलाई, 2015 को राजभवन के विशेष कार्याधिकारी अरुण कुमार ढौंडियाल ने पत्र भेजकर विवि के कुलसचिव से तीन सवाल पूछे। इन सवालों के साथ ही कहा गया कि स्पष्टीकरण किए जाने से पहले प्रश्नगत परीक्षा का आयोजन न किया जाए।

10 जुलाई, 2015 को उप सचिव घनश्याम शर्मा की ओर से कुलपति को पत्र भेजा गया है, जिसमें कहा गया है कि विवि की ओर से भेजा गया जवाब वांछित सूचनाओं के अनुरूप नहीं है और इसमें राज्यपाल की ओर से किए गए प्रश्नों का समाधान नहीं होता है। लिहाजा 7 जुलाई के पत्र के क्रम में 13 जुलाई को आवश्यक रूप से राज्यपाल को जानकारी उपलब्ध कराएं।

13 जुलाई, 2015 को विवि के कुलपति की ओर से पत्र का जवाब भेजा गया। इसमें पूरी प्रक्रिया बताई गई। बताया गया कि कार्यकारी परिषद का अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने ही लिखित परीक्षा का अनुमोदन इस आधार पर किया था क्योंकि कम पदों पर ज्यादा आवेदन आने की सूरत में साक्षात्कार से चयन संभव नहीं था। उन्होंने पत्र में यह भी साफ किया है कि विवि के एक्ट में कहीं भी इस तरह के बदलाव के लिए कुलाधिपति का अनुमोदन लेने का जिक्र नहीं है।

15 जुलाई को राजभवन के विशेष कार्याधिकारी अरुण ढौंडियाल की ओर से आयुर्वेद विवि को पत्र भेजा गया। इसमें लिखा गया है कि परीक्षा स्थगित करने का फैसला राजभवन नहीं, बल्कि विवि के स्तर पर लिया गया है।

इसमें यह भी कहा गया है कि राजभवन की ओर से कोई भी सदस्य चयन समिति के लिए नामित नहीं किया गया है, जबकि इस प्रक्रिया के लिए पूर्व राज्यपाल की ओर से डीके भट्ट को सदस्य नामित किया जा चुका है। विशेष कार्याधिकारी ढौंडियाल के मुताबिक चयन की प्रक्रिया यूजीसी, आयुष मंत्रालय और विवि के एक्ट के मुताबिक हो।

इसके लिए कोई भी फैसला लेने से पहले कार्य परिषद का अनुमोदन लिया जाए और इसके बाद कुलाधिपति यानी राज्यपाल का अनुमोदन लेने के बाद ही परीक्षा कराई जाए।

पत्र में यह भी कहा गया है कि मामले में कार्यकारी परिषद का अनुमोदन नहीं लिया गया है जबकि विवि के कुलपति अपने पहले के पत्र में यह साफ कर चुके हैं कि कार्यकारी परिषद का अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने ही इसका अनुमोदन किया है। पत्र में यह भी कहा गया है कि मामले के बारे में राज्य सरकार और कुलाधिपति को कोई जानकारी नहीं दी गई।

अब राजभवन ने विवि के पाले में डाली गेंद
राजभवन में विशेष कार्याधिकारी अरुण कुमार ढौंडियाल की ओर से भेजे गए ताजा पत्र में साफ किया गया है कि सभी नियमों के अनुरूप प्रक्रिया अपनाई जाए। उन्होंने साफ किया है कि पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक आधार पर पारदर्शिता के साथ हो।

विवि के अधिनियम एवं परिनियमों के मुताबिक विवि कार्यपरिषद में प्रकरण रखते हुए कार्यपरिषद का अनुमोदन प्राप्त कर लिया जाए। इसके बाद अधिनियम एवं परिनियम के तहत यथा आवश्यक प्रक्रिया संशोधन के लिए अनुमोदन प्राप्त करने को आवश्यक कार्रवाई के बारे में विवि को लिखा गया है। अब विवि को इस मामले पर अपना जवाब देना है।

आयुर्वेद विवि में चयन की कोई भी प्रक्रिया गलत नहीं है, बशर्ते उसमें यूजीसी, आयुष मंत्रालय और सभी संबंधित विभागों के नियमों का पालन करने के साथ ही पूर्ण पारदर्शिता बरती जाए।
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- डॉ. केके पॉल, राज्यपाल
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