प्रधानमंत्री ने 2025 तक देश को टीबी मुक्त कराने का लक्ष्य रखा है। जनवरी से दिसंबर 2018 तक प्रदेश में 21,390 टीबी रोगियों को चिह्नित कर इलाज देने का लक्ष्य है जबकि रिपोर्ट कहती है कि 6,428 टीबी रोगियों का प्रदेश में पता ही नहीं चल पा रहा है। प्राइवेट सेक्टर में भी मरीजों की संख्या में बड़ा अंतर है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि टीबी दवाएं आखिर कहां खप रही हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर में टीबी मरीजों का आंकड़ा जारी किया गया है। आंकड़े के अनुसार उत्तराखंड में पब्लिक सेक्टर में 10,140 और प्राइवेट सेक्टर में 11,250 मरीज हैं। कुल 21,390 मरीजों को चिह्नित कर उनका इलाज करना है। जबकि राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार पब्लिक सेक्टर में 11,896 और प्राइवेट सेक्टर में 3,066 ही मरीज हैं।
ये हैं आंकड़े
(केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े) (राज्य के आंकड़े)
जिला पब्लिक सेक्टर प्राइवेट सेक्टर पब्लिक सेक्टर प्राइवेट सेक्टर
अल्मोड़ा 623 692 295 00
बागेश्वर 260 289 152 00
चमोली 392 435 224 00
चंपावत 260 288 155 00
देहरादून 1702 1889 3538 1164
पौड़ी 688 763 713 04
हरिद्वार 1931 2143 2441 658
नैनीताल 957 1062 1788 810
पिथौरागढ़ 487 540 386 12
रुद्रप्रयाग 237 263 102 33
टिहरी 618 685 266 00
ऊधमसिंह नगर 1652 1833 1560 385
उत्तरकाशी 330 367 276 0
आईएमए से हुआ करार
टीबी मरीजों को चिह्नित करने और जागरूक करने के लिए केंद्र सरकार ने आईएमए (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) से भी करार किया है। आईएमए को कार्यशाला आयोजित करनी होगी साथ ही शिविर भी आयोजित करने होंगे। इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से बजट का प्रावधान किया गया है। इसके तहत निजी प्रैक्टिस करने वाले डाक्टरों को टीबी मरीजों की सूचना जिला क्षय रोग अधिकारी को देनी होगी। ताकि टीबी मरीज की इंट्री निक्षय पोर्टल पर हो सके।
केंद्र सरकार की ओर से आए आंकड़ों का लक्ष्य दिसंबर 2018 तक हासिल करना है। प्राइवेट सेक्टर में मरीजों की संख्या में भारी अंतर है। टीबी मरीजों को प्राइवेट सेक्टर में चिह्नित करने का प्रयास किया जा रहा है। देहरादून, नैनीताल और हरिद्वार की प्रगति रिपोर्ट ठीक है।
- डॉ. वगीश काला, राज्य समन्वयक क्षय रोग