स्थानीय निवासी मौ. नदीम और जाहिद सैफी ने बताया कि तब वह बच्चे थे। उनकी उम्र बमुश्किल पांच साल रही होगी। तब लैला आंटी और मजनूं अंकल की मोहब्बत की दास्तां सबकी जुबां पर थी। वह दोनों मौ. नदीम के बरामदे में रहते थे। दोनों का इस दुनिया में कोई नहीं था। हाजी बुरहान और आमिर कुरैशी ने बताया कि पूरा मोहल्ला उनकी मोहब्बत की बेहद कद्र करता था।
साथ ही लोग हर तरह से उनकी मदद भी करते थे। लंबे समय तक दोनों इसी बिल्डिंग के बरामदे में रहे। स्थानीय निवासी हाजी नसीम अहमद ने बताया कि दोनों की मोहब्बत की यह अमर प्रेम कथा हमेशा के लिए अमर हो गईं। उनकी याद में आज भी इस गली का नाम लैला वाली गली के नाम से जाना जाता है। जिस बरामदे में लैला रहती थी, उसे आज भी लैला की डाट के नाम से जाना जाता है।