वार्डों को डस्टबिन मुक्त बनाने की योजना रही फेल
नगर निगम ने वार्डों को डस्टबिन मुक्त करने की योजना तो बनाई, लेकिन यह व्यवस्था को और बर्बाद कर गई। गलियों में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन के लिए जिन एजेंसियों को जिम्मेदारी दी गई उन्होंने भी लापरवाही बरती। डस्टबिन के अभाव में कामकाजी लोग और कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का आज भी हाल है कि वह खुले में या खाली जमीन में कूड़ा फेंककर निकल जाते हैं। नगर निगम ने कई वार्डों में चालान की कार्रवाई की, लेकिन जहां तहां कूड़ा फेंकने की आदत से नगरवासी बाज नहीं आए। वहीं कूड़ा निस्तारण के लिए सराय में जिस प्लांट की क्षमता 220 मिट्रिक टन से बढ़ाने की बात की जा रही थी वहां क्षमता तो नहीं बढ़ी। जमीन खरीद में भ्रष्टाचार का मामला केवल बढ़ता गया।
सभी बिंदुओं पर फेल रहा नगर निगम हरिद्वार
स्वच्छ सर्वेक्षण में मूल्यांकनकर्ता निगरानी प्रकोष्ठ, थोक अपशिष्ट प्रबंधन, कूड़ा उत्सर्जन और निस्तारणस, कंप्यूटर सहायता प्राप्त व्यक्तिगत साक्षात्कार के अलावा नागरिक प्रतिक्रिया भी अहम होती है। इन सभी बिंदुओं पर नगर निगम फिसड्डी साबित हुआ है। इसी तरह सामुदायिक शौचालय और सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति भी बेहद खराब रही। घरेलू अपशिष्ट, कचरा मुक्त शहर, ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में भी कोई नया कार्य नहीं किया गया। एसटीपी की व्यवस्था हरिद्वार में हमेश चर्चा में रही है। इसमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में क्षमता बढ़ना तो दूर हमेशा अनदेखी के चलते प्लांट भी निष्क्रिय होते गए। वर्षा जल निकासी की दिशा में और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में भी नगर निगम ने कोई कार्य नहीं किया।