एनजीटी ने स्पष्ट किया कि 22 अगस्त, 2013 की अधिसूचना के जरिये मिली छूट के मुताबिक पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 के तहत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की आवश्यकता नहीं है। पीठ ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यूसी ध्यानी की अध्यक्षता में एक समिति भी गठित की, ताकि परियोजना की पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) के कार्यान्वयन की निगरानी की जा सके।
समिति में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, राष्ट्रीय आपदा आपदा प्रबंधन संस्थान, केंद्रीय मृदा संरक्षण अनुसंधान संस्थान, वन अनुसंधान संस्थान, वन व पर्यावरण विभाग के सचिव और संबंद्ध जिला मजिस्ट्रेट शामिल हैं। एनजीटी ने अधिकारियों को यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे धार्मिक स्थानों की पदयात्रा करने वालों के लिए भी एक तंत्र बनाने को कहा।
अधिकरण ने कहा कि प्रशासन को ऐसी नीति तैयार करने के लिए कहा गया, जिससे 10 साल से अधिक पुराने डीजल वाहन और 15 साल से अधिक पुराने पेट्रोल वाहन परियोजना की सड़कों पर नहीं चल सकें। एनजीटी का फैसला विभिन्न एनजीओ द्वारा दायर याचिकाओं पर आया था। दरअसल, याचिकाओं में कहा गया था कि परियोजना के कार्यान्वयन की पर्यावरण मंजूरी जरूरी थी। बिना मंजूरी हो रहे कार्य पूरी तरह से अवैध हैं।
11,700 करोड़ रुपये लागत की इस परियोजना के तहत 8542.41 करोड़ रुपये के 37 कार्य स्वीकृत हो चुके हैं। 6683.58 करोड़ की 28 योजनाओं पर काम शुरू हो चुका है। 246.39 करोड़ के तीन कार्य की निविदाओं के अनुबंध हो चुके हैं। 1374.67 करोड़ की चार योजनाओं की निविदाएं प्राप्त हो गई हैं। 237.75 करोड़ के दो कार्य के लिए निविदाएं आमंत्रित की जा चुकी हैं।
81.50 प्रतिशत वन भूमि हस्तांतरण का काम पूरा
परियोजना के तहत 81.50 प्रतिशत वन भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसके तहत 841.46 किमी लंबाई में भूमि हस्तांतरित होनी है। इसमें से 685.70 प्रतिशत भूमि के हस्तांतरण की स्वीकृति हो चुकी है।