सुप्रीम कोर्ट ने श्रीनगर जल विद्युत परियोजना से प्रभावित परिवारों के मुआवजे के मामले में राज्य के मुख्य सचिव को शपथ पत्र जमा करने का नोटिस जारी किया है। मामला वर्ष 2013 में आई आपदा में जलमग्न हुए श्रीनगर के भक्तियाना क्षेत्र का है।
एनजीटी ने अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी को प्रभावितों को मुआवजा देने के निर्देश दिए थे, जबकि परियोजना कंपनी ने एनजीटी के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। वर्ष 2013 की आपदा में श्रीनगर का भक्तियाना क्षेत्र जलमग्न हो गया था।
श्रीनगर बांध प्रभावित संघर्ष समिति ने अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी (एचपीसी) को इसका जिम्मेदार बताया था। समिति का कहना था कि परियोजना कंपनी की ओर से अलकनंदा नदी किनारे डंप लाखों टन मलबा बह गया था।
इस मलबे के कारण शहर के निचले हिस्सों में पानी भरने से मलबा भी आवासीय भवनों और सरकारी, गैर सरकारी इमारतों में घुस गया। आठ फुट से अधिक तक मिट्टी भवनों में भर गई थी।
श्रीनगर बांध आपदा संघर्ष समिति व माटू संगठन ने वर्ष 2013 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में बांध परियोजना कंपनी की ओर से मुआवजा दिए जाने के लिए वाद दायर किया था। एनजीटी ने 19 अगस्त 2016 को समिति को सही ठहराते हुए 9 करोड़ 27 लाख का मुआवजा मंजूर किया था।
एनजीटी के फैसले के खिलाफ परियोजना कंपनी सुप्रीम कोर्ट चली गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने प्रभावितों को अपने दावे एसडीएम के पास जमा करने और एसडीएम को उस पर रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल करने का आदेश दिया था।
प्रभावितों के वकील संजय पारिख ने कोर्ट में बताया कि प्रभावित अपने विस्तृत दावे 2016 में एसडीएम के समक्ष दायर कर चुके हैं, लेकिन राज्य सरकार ने अभी तक अपनी रिपोर्ट दाखिल नहीं की है। अब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को अपना शपथ पत्र दाखिल करने को कहा है। मामले में अब अगली सुनवाई के लिए छह सप्ताह बाद की तिथि नियत की गई है।