अगर कुछ करने का हौसला है और तो फिर हार मानने की जरूरत नहीं है। सच्ची लगन और मेहनत आपके लिए सफलता के दरवाजे अपने आप खोल देगी। जरूरत केवल लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने की है।
ऐसी ही कहानी मेरी भी है। जिसे मैं आप सभी से बांटना चाहती हूं ताकि इससे प्रभावित होकर कोई ओर भी सफलता की ओर अग्रसर हो सके। मैं अपनी चार बहनों में तीसरे नंबर की हूं। चार साल की थी तभी शिक्षक पिता धर्म सिंह का निधन हो गया था। मां विमला देवी की उम्र बमुश्किल 25-26 साल थी।
हर कोई मां पर दूसरी शादी करने के लिए दबाव डाल रहा था। कमाई का कोई साधन नहीं था। परिवार के लोग इस बात के भी विरोधी थे कि लड़कियों को पढ़ाया जाए लेकिन मां ने बेटियों के लिए संघर्ष करने का रास्ता चुना। कड़ी मेहनत कर और परिवार का विरोध झेलकर सभी को पढ़ाया।
फिर भी परिवार वाले जल्दी-जल्दी सबकी शादी करने का दबाव डालते रहे। अन्य बहनों के साथ ही मेरी शादी भी वर्ष 1993 में उस वक्त कर दी गई जब मैं कक्षा नौ में पढ़ती थी। मन में पढ़ने की काफी लगन थी लेकिन बीच में ही पढ़ाई बंद हो गई।