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अपने सपने के लिए मां-बेटी ने समाज से लड़ी 'जंग'

Mon, 27 Apr 2015 07:37 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, रुड़की
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अगर कुछ करने का हौसला है और तो फिर हार मानने की जरूरत नहीं है। सच्ची लगन और मेहनत आपके लिए सफलता के दरवाजे अपने आप खोल देगी। जरूरत केवल लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने की है।
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ऐसी ही कहानी मेरी भी है। जिसे मैं आप सभी से बांटना चाहती हूं ताकि इससे प्रभावित होकर कोई ओर भी सफलता की ओर अग्रसर हो सके। मैं अपनी चार बहनों में तीसरे नंबर की हूं। चार साल की थी तभी शिक्षक पिता धर्म सिंह का निधन हो गया था। मां विमला देवी की उम्र बमुश्किल 25-26 साल थी।

हर कोई मां पर दूसरी शादी करने के लिए दबाव डाल रहा था। कमाई का कोई साधन नहीं था। परिवार के लोग इस बात के भी विरोधी थे कि लड़कियों को पढ़ाया जाए लेकिन मां ने बेटियों के लिए संघर्ष करने का रास्ता चुना। कड़ी मेहनत कर और परिवार का विरोध झेलकर सभी को पढ़ाया।
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फिर भी परिवार वाले जल्दी-जल्दी सबकी शादी करने का दबाव डालते रहे। अन्य बहनों के साथ ही मेरी शादी भी वर्ष 1993 में उस वक्त कर दी गई जब मैं कक्षा नौ में पढ़ती थी। मन में पढ़ने की काफी लगन थी लेकिन बीच में ही पढ़ाई बंद हो गई।
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शादी के बाद पास की इंटर की परीक्षा

ससुराल में आकर बच्चों और परिवार को संभालने में लग गई लेकिन मन की लगन कहीं न कहीं कचोटती थी। ऐसे में छह साल बाद 1999 में फिर किताबें थामीं और हाईस्कूल करने के बाद इंटर की परीक्षा पास की।

शिक्षा मित्र के रूप में गांव में पढ़ाया और फिर विभाग की ओर से बीटीसी पास की। इस दौरान पति और परिजनों ने भी सहयोग किया। इसके बाद सीटेट की परीक्षा पास कर वर्ष 2013 में सरकारी शिक्षिका बन गई।

अब अधिकारियों ने मुझे मोहितपुर, भगवानपुर स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की वार्डन की जिम्मेदारी सौंपी है। पति का भगवान की कृपा से दो बेटे हैं जो पढ़ाई लिखाई में ठीक चल रहे हैं।

मां के संघर्ष का ही परिणाम है कि चारों बहनें अब सरकारी शिक्षक हैं और सभी हंसी-खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं। सभी बहनों को मां ने हौसलों की उड़ान के लिए आसमान दिया। मां के संघर्ष को शत-शत नमन।

प्रोफाइल
श्रीमती बबली पत्नी जरनैल सिंह
हाल निवासी कृष्णानगर, रुड़की
पैतृक गांव डालूवाला मजबता, बुग्गावाला क्षेत्र
इस समय कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय की वार्डन
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