शहर के कॉलेजों में एबीवीपी और एनएसयूआई के लिए कमजोर प्रत्याशी और आपसी गुटबाजी हार की वजह बनी। डीएवी हो या एमकेपी, एसजीआरआर। सभी जगहों पर दोनों संगठन इन चुनौतियों से जूझते नजर आए। नतीजा अप्रत्याशित हार के तौर पर सामने आया।
डीएवी कॉलेज में इस साल कॉलेज खुलने के साथ ही एबीवीपी की गुटबाजी सामने आने लगी थी। चिंगारी धीरे-धीरे शोला बनती चली गई। संगठन स्तर पर बागियों को मनाने के प्रयास नाकाफी नजर आए। नतीजे के तौर पर कॉलेज के सात पूर्व अध्यक्षों ने निखिल शर्मा को मैदान में उतार दिया। संगठन स्तर पर मनाने की कवायद के बजाए इन सभी को बाहर का रास्ता दिखाना भी भारी पड़ा। वहीं, एनएसयूआई की एकता काम न आई। प्रत्याशी मजबूत होने के बावजूद वोट बैंक या पुरानी फूट का असर चुनाव पर नजर आया। डीबीएस कॉलेज में एनएसयूआई की लगातार तीसरी हार से संगठन सकते में है।
एसजीआरआर पीजी कॉलेज में भी एबीवीपी में दो साल से चल रही बगावत हार के रूप में सामने आई। गत वर्ष एबीवीपी से बागी होकर सक्षम ग्रुप बनाने वाले विपिन काम्बोज, सोनू सरदार के ग्रुप ने लगातार दूसरे साल अध्यक्ष पद पर कब्जा जमाया। एमकेपी कॉलेज में एनएसयूआई के लिए पूर्व अध्यक्ष निवेदिता की बगावत हार की वजह बन गई। निवेदिता की प्रत्याशी भले ही तीसरे स्थान पर रही लेकिन एनएसयूआई का वोट काटने में आगे रही। एमपीजी कॉलेज मसूरी में मुकाबला कांटे का रहा। दून विवि में एनएसयूआई की घुसपैठ एबीवीपी के मुकाबले कमजोर दिखी। रायपुर कॉलेज में पहली बार चुनाव हुआ और क्षेत्रीय आधार पर मजबूत तानिया ने जीत दर्ज की।
ओम कक्कड़ ने फिर साबित की काबिलियत
डीएवी में हर साल एबीवीपी की जीत के चाणक्य माने जाने वाले वरिष्ठ छात्र नेता ओम कक्कड़ ने फिर अपनी काबिलियत साबित कर दी। उन्होंने संगठन से बागी होकर निखिल शर्मा को चुनाव लड़वाया और 661 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। हालांकि उन्होंने इस जीत का श्रेय सभी पूर्व अध्यक्षों और निखिल की मेहनत को दिया।