बृहस्पतिवार को आखिरकार गांधी जयंती पर पर्वतीय क्षेत्रों के पटवारियों ने पुलिस का काम छोड़ दिया। पुलिस कार्य का इन्हें न वेतन मिलता है और न भत्ते। ऐसे में पुलिस कार्य छोड़ने पर पटवारियों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।
दूसरी ओर अब नायब तहसीलदारों को पर्वतीय क्षेत्रों में कानून व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी दे दी गई है। हालांकि नायब तहसीलदार भी बेहद कम है और हड़ताल लंबी खिंची तो नायबों को भी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
पर्वतीय क्षेत्रों में पुलिस का काम करीब 930 पटवारियों के जिम्मे है। पटवारियों को हालांकि थानाध्यक्षों के अधिकार प्राप्त हैं पर इसके अलावा इन्हें कोई संसाधन नहीं है। मसलन राजस्व उपनिरीक्षक या पटवारी न तो हथियार रख सकते हैं और न ही वाहन और अन्य कोई सुविधा इनको मिली हुई है। इसी कारण पटवारियों को गांधी पुलिस भी कहा जाता है।
2004 से पटवारी राजस्व पुलिस का काम करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों की मांग कर रहे हैं पर यह सब ठंडे बस्ते में हैं।
नायब तहसीलदार करेंगे पुलिस का काम
बृहस्पतिवार से पटवारियों की ओर से पुलिस का काम छोड़ देने पर सारी जिम्मेदारी नायब तहसीलदारों पर आ गई है। हालांकि बहुत लंबे समय तक शायद नायब तहसीलदार भी इस काम को न देख पाएं।
कारण यह भी है कि प्रदेश में कुल मिलाकर करीब 87 नायब तहसीलदार हैं। इनमें से करीब 23 ही हैं जो सीधी भर्ती के हैं। ऐसे में राजस्व के अलावा पुलिसिंग इनका काम बढ़ाने वाला ही साबित होगा। पर्वतीय पटवारी महासंघ के संरक्षक बीपी जगूड़ी के मुताबिक किसी भी सूरत में मांग न माने जाने तक पटवारी राजस्व पुलिस का काम नहीं संभालेंगे।
यह है मुख्य मांग
राजस्व पुलिस व्यवस्था के लिए संसाधन दिया। राजस्व पुलिस व्यवस्था को हाइटेक किया जाए। राजस्व पुलिस में पदों को बढ़ाया जाए। अनुसेवकों को अधिकार और संसाधन दिए जाएं। राजस्व पुलिस के लिए अलग से बजट की व्यवस्था की जाए।
पहले सात थे, अब दो के जिम्मे सारी व्यवस्था
पहले ये थी व्यवस्था- पेशकार (अब नायब तहसीलदार) पुरानी तहसील पहले पेशकारियां थीं, पटवारी और अनुसेवक, जनता की तरफ से सयाना, प्रधान और उपप्रधान, कुल सात लोगों की टीम।
अब राजस्व पुलिस का काम केवल पटवारी और कानूनगो संभाल रहे हैं। उत्तराखंड बनने पर पेशकार और अनुसेवक का पद खत्म हो गए।