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बिन नंबरिंग कैसे सुधरें स्ट्रीट लाइटें 

Sun, 16 Apr 2017 12:57 PM IST
सुनीत द्विवेदी / अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : demo pic
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देहरादून नगर निगम क्षेत्र में 2008 के बाद से स्ट्रीट लाइटों के पोलों पर नंबर डालने का काम नहीं हुआ है। नंबरिंग न होने से शिकायत मिलने के महीनों बाद स्ट्रीट लाइटें ठीक होती हैं।
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2008 में स्ट्रीट लाइटों की संख्या 28 हजार थी, जो अब बढ़कर 42 हजार पहुंच गई है। नगर निगम ने भी अब तक इसके लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किया है। जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। 

नगर निगम के अधिकतर वार्डों में स्ट्रीट लाइटें अक्सर खराब रहती हैं। इससे लोगों को समस्या का सामना करना पड़ता है। इसकी शिकायत नगर निगम में दर्ज कराने के बाद भी महीनों तक समस्या का समाधान नहीं हो पाता है। करीब नौ साल से स्ट्रीट लाइट के पोलों पर नंबर लिखने का काम नहीं हुआ है।
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2008 में करीब 28 हजार स्ट्रीट लाइटें थीं। जिन पर नंबर डालने को लेकर 60 रुपये प्रति पोल के हिसाब से 16 लाख 80 हजार रुपये खर्च हुए थे। वहीं अब इसकी संख्या बढ़कर 42 हजार पहुंच गई है। ऐसे में यदि 60 रुपये प्रति पोल के हिसाब से नंबर डालने का कार्य हो तो करीब 25 लाख रुपये खर्च होंगे। 

यह है व्यवस्था 
स्ट्रीट लाइट खराब होने पर लोग इसकी शिकायत निगम के विद्युत अनुभाग में दर्ज कराते हैं। यहां वह पता और मोबाइल नंबर देते हैं, लेकिन निगम के कर्मचारी अपनी सुविधानुसार मौके पर पहुंचते हैं। ऐसे में किसी कारणवश यदि शिकायतकर्ता का नंबर नहीं मिलता है तो वह खाली हाथ लौट आते हैं। अगर पोल नंबर पता हो तो कर्मचारी आसानी से वहां पहुंचकर स्ट्रीट लाइट ठीक कर सकते हैं।  

बजट मिलता है पर नहीं होता काम 
ऐसा नहीं है कि निगम में पोल नंबरिंग का बजट नहीं है। वर्ष 2016-17 में भी 10 लाख रुपये का बजट पोल लगाने और उसकी नंबरिंग पर खर्च के लिए रखा गया था। बावजूद इसके काम नहीं हुआ। 
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स्ट्रीट लाइट से संबंधित मामलों को दिखाया जाता है। कर्मचारी मौके पर जाते हैं। पार्षद से संपर्क कर समस्या का समाधान किया जाता है।
- रवनीत चीमा, नगर आयुक्त
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