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...तब बेहद खफा लगे थे अमरकांत

Tue, 18 Feb 2014 10:37 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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‘इस बात को लगभग चार साल हुए होंगे। अमर कांत अपने एक परिजन के यहां किसी आयोजन में हरिद्वार आए हुए थे। उस दौरान वह ठीक से बोल भी नहीं पा रहे थे। लेकिन तब भी जितनी भी बात उनके एक रिश्तेदार के मार्फत हुई, वह वर्तमान साहित्य सिस्टम से बेहद खफा दिखे। हिंदी साहित्य के लिए उन्होंने जो किया, उसका आर्थिक आंकलन बहुत कष्ट देने वाला था। यही उनकी पीड़ा भी रही...’।
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यकीन ही नहीं हुआ
साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने अमरकांत से अपनी संक्षिप्त मुलाकात को इन्हीं शब्दों में व्यक्त किया। उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि कथाकार अमरकांत अब इस दुनिया में नहीं।

बकौल नौटियाल दून से प्रत्यक्ष रूप से अमरकांत का नाता नहीं रहा, लेकिन दून के तमाम साहित्यकारों का उनकी रचनाओं के माध्यम से उनसे एक अनदेखा रिश्ता कायम हो गया था।
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इन तमाम साहित्यकारों में आज शोक की लहर है। क्योंकि उनके बकौल अमरकांत का जाना किसी का एक दुनिया से चले जाना भर नहीं। यह साहित्य जगत को एक महान कथाकार की क्षति है, जो हमेशा खलेगी।

‘दोपहर का भोजन’ महानतम
अमरकांत से मेरी मुलाकात इलाहाबाद में हुई थी। वह नए लेखकों को पसंद करते थे, उनकी हौसला अफजाई करते थे। उनका लेखन औरों से हटकर था। उन्होंने हिंदी गद्य साहित्य को नई ऊंचाई दी। व्यक्तिगत बात करूं तो मेरी नजर में उनकी ‘दोपहर का भोजन’ महानतम रचना है। श्रीलाल शुक्ल ने जहां उपन्यास विधा को समृद्ध किया, वहीं अमरकांत ने कथा साहित्य को। उनकी कमी हमेशा महसूस होगी।
लीलाधर जगूड़ी, वरिष्ठ कवि, रचनाकार।

‘इन्हीं हथियारों से’ नहीं भूलती
अमरकांत से कभी मिलने का मौका नहीं मिला, लेकिन रचनाओं के माध्यम से उन्हें खूब जाना। उनका ‘इन्हीं हथियारों से’ उपन्यास कभी भूलता नहीं। इसी पर उन्हें 2007 का ज्ञानपीठ और 2009 का व्यास सम्मान मिला था। इस उपन्यास के माध्यम से उन्होंने समकालीन विसंगतियों की तरफ इशारा किया था। पत्रकार रहते हुए उन्होंने साहित्य का जिस परंपरा का निर्वहन किया वह बिरले ही कर पाते हैं।
डा. दिनेश चमोला, साहित्यकार।

‘अमरकांत नहीं रहे...’ यह सुनकर ही बड़ा रीतापन-सा महसूस हो रहा है। यह सच है कि हिंदी गद्य की तन-मन से सेवा करने के बाद धन की कमी उन्हें हमेशा महसूस होती है। इसीलिए उन्होंने कहा था कि हिंदी साहित्यकार होना ही सबसे बड़ी विडंबना है। उनकी अनेक कहानियां इन नजरों से गुजरीं। अभी भी अलमारी में सबसे ऊपर की शेफ में अमरकांत का कथा साहित्य ही स्थान लिए हुए है। उनकी कमी हमेशा रहेगी।
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जितेन ठाकुर, वरिष्ठ कहानीकार।
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