102 वर्षीय राज्य आंदोलनकारी सुमति पटवाल का बुधवार सुबह निधन हो गया। वह पिछले काफी समय से अस्वस्थ थीं। राज्य आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही। आंदोलन के दौरान चार दिन वह दून की पुरानी जेल में रहीं, लेकिन आंदोलनकारी होने के बावजूद उन्होंने सरकार की ओर से मिलने वाली पेंशन नहीं ली।
राज्य गठन के बाद भी सुमति जन समस्याओं से जुड़े मुद्दों को लेकर सक्रिय रहीं। हरिद्वार में सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। सुमति पटवाल मूल रूप से पौड़ी के पटवाल शिवपट्टी, थापली गांव की रहने वाली थीं। दून में माता मंदिर रोड अजबपुर कला में वर्तमान में निवास था।
वर्ष 1994 से उनकी उत्तराखंड राज्य आंदोलन में सक्रिय भागीदारी रही। वह उत्तराखंड महिला मंच से जुड़ी थीं। सुमति के चार बेटे बचन सिंह, दयाल सिंह, नरेंद्र सिंह, अशोक एवं चार बहू एवं नाती-पोते हैं।
उनका करीब 25 लोगों का भरा पूरा परिवार है। आंदोलनकारी सरला रावत, निर्मला बिष्ट के साथ आंदोलनकारियों ने उनके निधन पर शोक जताया है। उन्होंने कहा कि सुमति का निधन राज्य के लिए बड़ी क्षति है।
साथी आंदोलनकारी 70 वर्षीय भुवनेश्वरी कठैत के अनुसार, सुमति पटवाल में गजब का जज्बा था। वह निडर राज्य आंदोलनकारी थीं। मुजफ्फरनगर कांड की सूचना मिलने पर उन्होंने देहरादून में एसडीएम का कालर पकड़कर उन्हें खींच लिया था। उनका कहना था कि मुजफ्फरनगर में गायब हुईं महिलाओं और अन्य आंदोलनकारियों को सुरक्षित वापस लाया जाए।
इसके अलावा आंदोलनकारी महिलाएं जब 14 दिन जेल रहीं तो सुमति ने उन्हें छुड़ाने के लिए जेल भरो आंदोलन शुरू किया। इसी का नतीजा रहा है कि उन्हें भी जेल जाना पड़ा। सुमति की बहू सावित्री पटवाल बताती हैं कि राज्य आंदोलन के दौरान सभी लोग गांधी पार्क और कचहरी स्थित शहीद स्मारक पर एकत्रित हुआ करते थे।
राज्य आंदोलन स्वत: स्फूर्त था। इसके लिए कभी किसी को घरों से नहीं बुलाया जाता था। सुमति पटवाल को मुजफ्फरनगर कांड ने अंदर तक झकझोर दिया था। मुजफ्फरनगर में आंदोलनकारियों पर लाठियां और गोलियां बरसाने के साथ ही महिलाओं के साथ जिस तरह से अभद्रता हुई, इससे वह बेहद आहत थीं। इसकी खबर मिलते ही उन्होंने आंदोलनकारी महिलाओं के साथ दून में एडीएम का घेराव कर दिया था।